२९४. पत्र : अब्बास तैयबजीको
[१ सितम्बर, १९२९]
चैककी पहुँच बाकायदा भेजी जा रही है। जबतक तुम्हारा दिल और डाक्टर यह कहते हैं कि तुम्हें घरसे ज्यादा दूर नहीं जाना चाहिए, तब तक दूसरे लोग इसके बारेमें चाहे कुछ भी कहें उससे क्या बनता - बिगड़ता है ? लेकिन बस अब जल्द ही तुमको सत्तर सालके खुर्राट बूढ़ेकी बजाय सत्रह सालका नौजवान बन जाना चाहिए ।
तुम्हारा,
भुरर्रर
रहानाके आनेपर मैं उसे तुम्हारा पैगाम दे दूंगा ।
मो० क० गांधी
अंग्रेजी (एस० एन० ९५६७ ) की फोटो - नकलसे ।
२९५. पत्र : बहरामजी खम्भाताको
साबरमती
२ सितम्बर, १९२९
आपका पत्र मिला । मैं ७ तारीखके दोपहरको २ बजे रेवाशंकरभाईके यहाँ पहुँचनेकी उम्मीद करता हूँ। सुबहकी पहली गाड़ीसे दादर उतरकर विलेपारले जाऊँगा और वहाँसे २ बजे बम्बई पहुँच जाऊँगा । आपका कार्यक्रम ठीक है । साढ़े पाँच बजे रखें तो ठीक होगा। छः बजे तो और ठीक होगा। मुझे डाक्टरोंने मना किया है, इसलिए कुछ मिनट ही बोल पाऊँगा । क्या पूरा कार्यक्रम डेढ़ घंटेमें समाप्त नहीं हो सकता । किन्तु म आपको किसी परेशानी में नहीं डालना चाहता । मेरे लिए कुछ और करना जरूरी नहीं है । मुझे ले जाना। दादरमें मिलना चाहें, तो मिल लेना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ६५९५ ) की फोटो - नकलसे ।
१. ढाकखानेकी मुहरके अनुसार ।