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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/४३

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आदर्श बालमन्दिर

है। अगर आज हमारे घर छिन्न-भिन्न हो गये हैं, माता-पिता बालकोंके प्रति अपने कर्तव्योंको भूल गये हैं, तो इस हालत में बच्चोंको तालीम जहाँतक हो सके, ऐसे वायुमण्डल में दी जानी चाहिए, जहाँ रहकर बालक कुटुम्बमें रहनेका ही अनुभव कर सके। इस धर्मका पालन माता ही कर सकती है, अतएव बच्चोंकी शिक्षाका प्रबन्ध स्त्रियोंके ही हाथोंमें होना चाहिए। स्त्री जिस प्रेम और धीरजसे काम कर सकती है, पुरुष आजतक उसका परिचय नहीं दे सका है। अगर यह सब सच है, तो बाल-शिक्षा की समस्याको हल करते समय सहज रूपसे स्त्री-शिक्षाकी समस्या हमारे सामने आ खड़ी होती है। मुझे यह कहते हुए थोड़ा भी संकोच नहीं होता कि जब तक सच्ची बाल-शिक्षा देने योग्य माता तैयार नहीं होती तबतक बालकोंके लिए सैकड़ों पाठशालाएँ होते हुए भी वे शिक्षासे शून्य ही रहेंगे।

अब मैं बाल शिक्षाको रूप-रेखाके सम्बन्धमें दो बातें कहूँगा। मान लीजिये कि एक माता-रूपिणी स्त्रीकी देखरेख में पाँच बालक हैं। इन बालकोंको न तो बोलनेकी तमीज है, न चलनेका भान; नाकसे जो रेंट बहती है, उसे वे हाथसे पौंछकर या तो पैरोंपर गिरा लेते हैं या अपने कपड़ोंपर। आँखें गोडसे भरी रहती है; कानों और नाखूनों में मैल भरा रहता है; बैठने के लिए कहनेपर पैर फैलाकर बैठते हैं; जब बोलते हैं तो मानो फूल झड़ते हैं; 'हूँ' को 'शूं'[] कहते हैं और 'मैं' के बदले 'हम' का उपयोग करते हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिणका उन्हें ज्ञान नहीं होता। वदनपर मैले कपड़े पहने रहते हैं। गुह्य इन्द्रिय खुली रहती है, उसे मला करते हैं, मना करनेपर और ज्यादा मलने लगते हैं। अगर जेब है तो उसमें एक-न-एक मैली कुचैली मीठी चीज़ पड़ी रहती है, जिसे वे समय-समयपर निकालकर चबाते रहते हैं, उसका कुछ भाग जमीनपर बिखेरते रहते हैं और पहलेसे चिकटे अपने हाथोंको और चिकटे बनाते चले जाते हैं। सिरपर जो टोपी होती है उसका निचला भाग कोयले जैसा काला होता है और उसे हाथ में लेते ही बदबू आती है। इन पाँच बालकोंकी देखरेख करनेवाली स्त्रीके मनमें यदि मातृ-भावना जागे, तभी वह इन्हें शिक्षा दे सकती है। पहला सबक उन्हें राहपर लगानेका होगा। माँ उन्हें प्रेमसे नहलायेगी, कई दिन उनके साथ हँसी-खेल और बातचीत में ही बितायेगी, और कई तरहसे, जैसे अबतक माताओंने किया है, जैसे कौशल्याने बालक रामके प्रति किया था, उसी तरह, यह माता भी इन बालकोंको अपने प्रेम-पाशमें बांधेगी और फिर जैसा नचाना चाहेगी वैसा नचायेगी। जबतक माताके पास यह गुण नहीं होगा, वह बिछुड़े हुए बछड़ेके पीछे विकल होकर चारों ओर चक्कर लगानेवाली गायकी तरह, इन पाँच बालकोंके पीछे दौड़ा नहीं करेगी, चक्कर नहीं काटती रहेगी जबतक ये बालक स्वेच्छासे साफ नहीं रहने लगते। इनके दाँत, कान, हाथ, पैर वगैरा जैसे चाहिए वैसे नहीं रहते, इनके गेंदले कपड़े जबतक साफ-स्वच्छ नहीं रहने लगते, और जबतक 'शूं' का 'हूँ' नहीं हो जाता है, तबतक माता अपने लिए आराम हराम

  1. १. गुजरातीमें 'हूँ' का अर्थ 'मैं' होता है और 'शूं' का नया। वहाँ कई लोग 'स' और 'द्द' के उच्चारणों में भेद नहीं करते।