उत्तर पश्चिम सीमाप्रान्त - की ओरसे उन्हें कोई सूचना ही नहीं मिली है । २२३० विवरणोंमें से, जिनके मिलनेकी आशा की जाती थी, केवल ८६ अर्थात् केवल ४ फीसदी विवरण ही मिले हैं। जुदा-जुदा प्रान्तोंके जिलोंकी संख्या नीचे लिखे अनुसार है :
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बरार महाराष्ट्र बिहार तामिलनाड संयुक्त प्रान्त मध्यप्रान्त (मराठी) गुजरात पंजाब
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६ ११ १६ ९ २७ ४ ४ १५
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उत्कल केरल सिन्ध बम्बई कर्नाटक बंगाल
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६ [ ३ ] ८ ७ ११ ३२ १६९
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सारे ब्रिटिश भारतमें कुल मिलाकर २५० से भी अधिक जिले हैं। इससे यह प्रकट होता है कि अबतक कांग्रेस दो-तिहाई जिलोंमें ही नाममात्रका कुछ काम हाथमें ले सकी है। ये चिह्न आशाजनक नहीं कहे जा सकते । समूचे देशसे अपनी बात कहनेवाली आज कांग्रेस ही एकमात्र संस्था है । यही एक ऐसी संस्था है, जिसका सुचारु संगठन और संचालन होनेसे सारे देशको स्वराज्य मिल सकता है। अगर कांग्रेसकी अधीनस्थ संस्थाएँ प्रधान कार्यालयसे प्राप्त सूचनाओं पर तत्काल ही अमल नहीं करेंगी, अथवा गाँव-गाँवमें नहीं तो कमसे कम हरएक जिले या ताल्लुकेमें अपनी शाखाएँ नहीं खोलेंगी, तो अवश्य ही वे इस कामके अयोग्य ठहरेंगी । विदेशी कपड़ेके बहिष्कार में सवाल मुख्यतः संगठनका है यह काम करने योग्य है; इसके इष्ट और आवश्यक होनेके बारेमें दो मत नहीं हैं। मगर जिन लोगोंको संगठित होना है अगर वे शिथिल या उदासीन रहें तो योग्यसे योग्य मन्त्री भी इस काम में सफल नहीं होगा । म चाहता हूँ कि तमाम प्रान्तोंके सभी जिम्मेदार कार्यकर्ता इन दुःखद तथ्यों पर जो मैंने ऊपर दिये हैं, गम्भीर रूपसे विचार करें और उसके लिए कोई उपाय ढूंढ़ निकालें । यह एक ऐसी त्रुटि है जिसका उपाय ढूंढ़ निकालना मुश्किल नहीं है। जिला और ताल्लुका समितियोंके मन्त्रियोंको यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर वे प्रधान कार्यालयसे प्राप्त सूचनाओं पर अमल नहीं करेंगे तो कांग्रेसकी बम्बई बैठकके निश्चयानुसार वे अनुशासनकी कार्रवाईके पात्र हो जाते हैं। अगर चुनावका काम मुझे सौंपा जाये तो मैं १६९ लापरवाह, चुप बैठे रहनेवाली और गैरजिम्मेदार संस्थाओंके बदले १६ ऐसी संस्थाओंको तरजीह दूंगा जो नियम-पालनमें मुस्तैद और सहयोगकी भावना रख कर काम करनेवाली हों । १६ प्राणवान संस्थाएँ कुछ काम करके दिखा सकती हैं, निष्क्रिय और निर्जीव १६९ संस्थाएँ तो भार-रूप ही सिद्ध हो सकती हैं । हमारा इन दोमें से क्या होना इष्ट है ?
यंग इंडिया, ५-९-१९२९