प्रयत्न किया है । अब वे अपने विवरणको मूर्तरूप दे पायें चाहे न दे पायें, दूसरोंको चाहिए कि जहाँतक वे पहुँचे हैं वहाँसे कामको अपने हाथमें ले लें । चरखेका यहाँ प्रस्तुत नक्शा पाठकोंके लिए इस दिशामें मार्गदर्शक सिद्ध होगा, ऐसी आशा है ।
यंग इंडिया, ५-९-१९२९
३०१. भारतकी सभ्यता
सन् १९२४ में जब मैं संयुक्त प्रान्त में भ्रमण कर रहा था, अयोध्याजीके नजदीक एक किसानने पुकारकर मेरी गाड़ीमें एक पर्चा फेंका। मैंने उस पर्चेको उठाया और देखा कि उसमें उसने तुलसीदासजीके रामचरित मानसमें से कई उपयोगी चौपाइयाँ और दोहे उद्धृत किये हैं । यह देखकर मुझे हर्ष हुआ और भारतवर्षकी सभ्यताके प्रति मेरे मनमें आदर बढ़ा। उस पर्चेको मैंने अपने दफ्तरमें इस इच्छासे रख छोड़ा था कि किसी-न-किसी रोज उसे 'नवजीवन' में दे दूंगा ।
वैसे, प्रति सप्ताह मैं उसे देखकर छोड़ देता था । क्योंकि जब वह पर्चा मुझे मिला था, तब मैं 'हिन्दी नवजीवन' के लिए कुछ नहीं लिखता था । गुजराती 'नव- जीवन' के लिए मैंने उसे उतना उपयोगी नहीं समझा था, जितना 'हिन्दी नवजीवन' के लिए । पर्चेका एक हिस्सा गुजराती और हिन्दीमें सन् १९२७ में दिया गया था' ।
अब चूंकि मैं प्रति सप्ताह विशेष रूपसे कुछ न कुछ 'हिन्दी - नवजीवन' के लिए लिखता हूँ, और चूँकि अनकरीब ही फिरसे मेरा यू० पी०का दौरा आरम्भ होता है,
उस पर्चेका दूसरा हिस्सा यहाँ देता हूँ :
काहू सुमति कि खल सँग जामी,
सुभगति पाव कि परत्रिय गामी ।
राजु कि रहइ नीति बिनु जाने,
अध इहां न अघ कि रहहिं हरि चरित बखाने ॥
कि पिसुनता सम कछु आना,
धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥
पच्छपात कछु राखउं,
वेद पुरान संत मत भाषजं ॥
अरि बश दंउ जिआवत जाही,
मरनु नीक तेहि जीव न चाही ।
विश्वास न करही,
सत्य बचन बायस इव सबही ते डरही ॥
आरत का न करें कुकर्मू ।
१. देखिए खण्ड ३४, पृष्ठ ५३१-२ ।