गई है। लेकिन जो सहायक न बन सकें वे पहलेकी भाँति दान तो अब भी भेज सकेंगे, और मुझे आशा है कि वे बराबर दान भेजते रहेंगे।
नवजीवन, २-६-१९२९
७. पत्र : माधवजी वी॰ ठक्करको
साबरमती आश्रम
२ जून, १९२९
भाईश्री माधवजी, तुम्हारा पत्र मिल गया है। मैं जब भी आश्रम आता हूँ तब हमेशा ही पत्रोंका जवाब लिखनेको फुरसत कम रह जाती है। प्रयत्न करनेसे तुम्हारा क्रोध अवश्य जायेगा। मैं देखता हूँ कि तुम सावधान तो हो। तुम्हारा जीवन-वृत्तान्त पढ़कर मुझे प्रसन्नता हुई है। ईश्वर तुम्हें दीर्घायु करे, निरोगी बनाये और तुम्हारी सेवापरायणता में वृद्धि करे। कभी-कभी रोटी छोड़ देने अथवा दूसरी कोई चीज जो भारी लगती हो, छोड़ देने से लाभ ही होगा।
यह लिखानेके बाद आज तुम्हारा पत्र मिल गया है। देखता हूँ, तुम्हारी तबियत ज्वारभाटेकी तरह कम-ज्यादा होती रहती है । तुम जुलाईमें आओगे तो फिर ज्यादा अच्छी तरह इलाज हो सकेगा।
मोहनदासके वन्देमातरम्
८. पत्र : जमनालाल बजाजको
साबरमती आश्रम
२ जून, १९२९
चि॰ जमनालाल,
मैंने रुखीके[१] विषय में सन्तोकके[२] साथ बात कर ली है। गुजराती हिसाबसे वर्ष दिवालीको पूरा होता है। इसलिए इस वर्ष विवाह करना हो तो असाढ़ महीने में करना चाहिए; क्योंकि सन्तोक कहती है कि बादमें शादी हो ही नहीं सकती। असाढ़में करना बहुत जल्दी हो जायेगा। इसके सिवा सन्तोकका आग्रह है कि बनारसी, विवाह होनेके पहले, गुजराती सीख ले। इसलिए वह कहती है कि अगर विवाह अगले साल हो तो जेठ महीने में हो। इसलिए बात एक साल आगे सरक गई। सन्तोकके मनमें यह लोभ तो है ही कि रुखी इस दरमियान अधिक पढ़-लिख ले। यह ठीक लोभ है।