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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/४६२

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मुझे इस बातका बड़ा दुःख और संकोच है कि मैं कांग्रेसके अगले अधिवेशन के सभापतिके चुनाव के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी बैठक बुलानेमें निमित्त बना हूँ । मित्रगणोंने मुझे फौरी तार भेज भेज कर और पत्र लिख-लिख कर यह बताया कि मैं इस आनबानके मौके पर पीछे न हट्टू, अपने निर्णय पर पुनः विचार करूँ और अ० भा० कां० क० की बैठकको यथासम्भव टाळूं । इच्छा न रहते हुए भी मुझे उन्हें निराश करना पड़ रहा है । मैं उन्हें यही सन्तोष दिला सकता हूँ कि मेरे निर्णयके कारण उन्हें जो दुःख हुआ है, वह मेरे दुःखसे अधिक नहीं हो सकता । रहनुमाईके लिए ईश्वरी प्रेरणाकी प्रतीक्षामें मुझे विश्वास है । भीतरसे मुझे कोई प्रकाश मिल नहीं रहा है, न मैं अभी आत्मविश्वास एकत्र कर पाया हूँ ।

मुझे अपनी मर्यादाओंका भली-भाँति भान है । मैं कौंसिल प्रवेशके काममें विश्वास नहीं रखता। सरकारी स्कूलों और कालेजों पर भी मेरा विश्वास नहीं है । कथित न्यायालयों में तो और भी कम है। क्योंकि उनके द्वारा मिलनेवाला न्याय बहुत महँगा होता है, और जब सवाल शासक और शासित के बीचके किसी महत्वपूर्ण मुद्देके फैसले का होता है, तब तो इन न्यायालयोंसे न्यायका मिलना प्रायः असम्भव ही हो जाता है । जलसों और जुलूसों में भी मुझे कोई श्रद्धा नहीं । यद्यपि मैं मजदूरों और उनके लगातार कल्याणके लिए सत्ता और शक्ति चाहता हूँ, तथापि किसी राजनैतिक ध्येयकी पूर्ति मात्र के लिए उसका दुरुपयोग करनेमें मेरा विश्वास नहीं है । मैं शुद्ध, पवित्र अहिंसामें श्रद्धा रखता हूँ । दूसरे देशोंमें इसका परिणाम चाहे जो हुआ हो, लाखोंकी जान लेकर हिंसात्मक साधनों द्वारा भारतके लिए स्वराज्य पानेकी सम्भावनामें मेरा विश्वास नहीं है । मैं मानता हूँ कि स्वराज्य प्राप्तिके लिए हिन्दू, मुसलमान, सिख, पारसी, यहूदी और ईसाइयोंमें एकताका होना अत्यन्त आवश्यक है। अस्पृश्यता निवारणको भी मैं इस कार्यके लिए उतना ही आवश्यक समझता हूँ । अगर किसी अल्पसंख्यकके एक भी न्यायसम्मत अधिकारको कुचलनेसे स्वराज्य मिलता हो, तो भी मैं उसे पानेकी इच्छा न करूँगा । मैं नहीं मानता कि मुसलमान हिन्दुओंके जन्मजात शत्रु हैं या अंग्रेज भारतीयोंके । मैं अपने ध्येयकी प्राप्तिके लिए क्या मुसलमान और क्या अंग्रेज दोनोंका सहयोग चाहता हूँ । यद्यपि असहयोग मेरे जीवन-सिद्धान्तका अंग है, तथापि वह सहयोगका मंगलाचरण- मात्र है । मैं काम करनेकी पद्धतियों और प्रणालियोंसे असहयोग करता हूँ, मनुष्योंसे कदापि नहीं। हो सकता है कि मैं डायर जैसोंके लिए भी दिलमें बुरी भावना न रखूं। दुर्भावनाको मैं मनुष्यत्वका कलंक समझता हूँ । अगर पाठकोंने अबतक मेरी बात धीरजके साथ सुनी है, तो वे यह सुनकर भी अधीर न होंगे कि न तो मैं पूँजीपतियोंका दुश्मन हूँ, न देशी राज्योंका ही । मैं मानता हूँ कि पूंजीपति मजदूरोंकी उच्चतम स्थितिके अनुकूल हो सकते हैं और देशी राज्य मी अपनी जनताकी उच्चतम स्थितिके अनुकूल बन सकते हैं। मैं नहीं समझता कि