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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/४७१

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संयुक्त प्रान्तकी कुप्रथाएँ

यदि यह सच है कि संयुक्तप्रान्तके विद्यार्थियोंमेंसे बहुत ज्यादा विद्यार्थी विवाहित होते हैं, तो मुझे इससे एक दुःखद अनुभवका कारण समझमें आता है । हिन्दी-प्रचार संयुक्त प्रान्तका एक खास कर्तव्य है । जब इन्दौर में मैंने दक्षिण भारत में हिन्दी-प्रचारकी बात की थी, तब मुझे आशा थी कि इस कामके लिए चारित्र्यवान्, त्यागी, शिक्षित, राष्ट्र-भाषा-विशारद और ब्रह्मचारी संयुवक काफी संख्या में मिल सकेंगे। मगर पाठकोंको यह जानकर दुःख होगा कि संयुक्त प्रान्त से इस काम में बहुत कम सहायता मिली । आज भी ऐसे स्वयंसेवकोंके अभाव के कारण ही बंगाल, सिन्ध, उत्कल, इत्यादि प्रान्तोंमें राष्ट्रभाषाका प्रचार बहुत कम हो रहा है । इसका कारण धनका अभाव नहीं, बल्कि सच्चे स्वयंसेवकोंका अभाव ही है ।

विवाह में किये जानेवाले खर्चकी बात भी दुःखप्रद है । धनिक लोग हर जगह अपनी धनराशिके अभिमानमें आकर अमर्यादित खर्च करते हैं और गरीबोंमें बुद्धिभेद उपजाते हैं । इस सम्बन्धमें भी विद्यार्थियोंको चाहिए कि वे प्रतिज्ञाबद्ध होकर माता- पिताको विवाहके अवसर पर अधिक खर्च हरगिज न करने दें। जिन मित्रने मुझे यह पत्र लिखा है, वह मुझसे मिल चुके हैं। उन्होंने श्री जमनालालजीके उदाहरणकी याद दिलाते हुए मुझसे कहा कि मैं उस उदाहरणको विद्यार्थियों और उनके माता-पिताके सामने रखूं। जमनालालजीने अपनी पुत्री कमलाके विवाहके अवसर पर ५००) का खर्च भी शायद ही किया हो। उन्होंने जातिभोज तो दिया ही नहीं था । वरवधूको आशीष देनेके लिए कुछ मित्रोंको बुला लिया था । विवाह - विधि केवल धार्मिक क्रिया तक ही परिमित रही थी। हर प्रकारके आडम्बरका त्याग कर दिया गया था । वरवधू, दोनों, खादीके सादे कपड़े पहने हुए थे । ठीक इसी तरह हरएक धनाढ्यका धर्म है कि वह विवाह इत्यादि अवसरों पर अपने अभिमानको रोके और समाजको हानि पहुँचानेसे बाज आये ।

तीसरा प्रश्न पर्देका है। पर्देकी बुराईके बारेमें मैं काफी लिख चुका हूँ । यह प्रथा हर तरहसे अकल्याणकारिणी है । अनुभवसे यह सिद्ध हो चुका है कि स्त्रीकी रक्षा करनेके बदले यह स्त्रीके शरीर और मनको हानि पहुँचाती है ।

जमींदारोंके बारेमें मैं क्या लिखूं ? जमींदार वर्गमेंसे शायद ही कोई 'हिन्दी नवजीवन' पढ़ता हो । लेकिन चूँकि मैं मनुष्य स्वभावकी उन्नयन-शीलताको मानता हूँ, मेरा विश्वास है कि जमींदार लोग जापानके सामुराई अमीरोंकी तरह लोकसेवाका मन्त्र सीखेंगे और यथासम्भव त्यागमय जीवन बिताकर अपना एवं भारतवर्षका कल्याण करनेमें पूरा-पूरा योग देंगे । यह तो मेरी अपनी आशा है । 'हिन्दी नवजीवन में इसका उल्लेख मात्र करनेसे यह सफल नहीं हो सकती ।

हिन्दी नवजीवन, १२-९-१९२९

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