हूँ; आगे बढ़नेके पहले मुझसे आगरे में सात दिन तक आराम करनेकी अपेक्षा की गई है । कमजोरीके अलावा और कोई शिकायत नहीं है ।
हृदयसे आपका,
मारफत श्री सतीशचन्द्र गुह
दरभंगाअंग्रेजी (एस० एन० १५५५४ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
३४८. पत्र : छगनलाल जोशीको
आगरा
१४ सितम्बर, १९२९
तुम्हारे पत्रका जवाब मैं कल तो नहीं दे सका; क्योंकि मुझे तीन बजे पच्चीस मील दूरके एक गाँव में पहुँचना था ।
प्रदर्शनी के बारेमें जैसा झगड़ा हुआ, वैसा तो होता ही रहता है। यह सब सहन करते-करते ही तुम्हें अनुभव होगा । हारना नहीं और जबतक हार नहीं जाते तबतक पतवार न छोड़ना । जब आत्मविश्वास बिलकुल ही न रहे तब छोड़ देने में संकोच नहीं करना ।
मनकी अपूर्णता या चंचलताका मलिनतासे जो भेद है उसे हमेशा ध्यान में रखना । मलिनताके साथ आग्रहपूर्वक भी असहयोग करना । अपूर्णता अथवा चंचलता तो रहेगी ही । मुनिजन भी उन्हें पूरी तरह नहीं जीत पाये हैं तो हम जैसोंकी बिसात ही क्या है ? इस मामलेके बारेमें भाई माधवलालने लिखा है। उन्होंने खानगी जवाब माँगा है इसलिए लिफाफे में बन्द करके इसके साथ भेज रहा हूँ । किन्तु मैं आशा तो यही करता हूँ कि वह सबको पढ़ायेंगे । न पढ़ायें तो भी मुझे तुम्हें कुछ लिखना नहीं है । तुम धैर्यपूर्वक जैसे काम लेना योग्य हो, लेते रहना । बचानेवाला, फल देनेवाला ईश्वर तो ऊपर बैठा ही है तब हमें क्या चिन्ता ?
सूरजबहनके बारेमें करसनदासको लिखा है । तुम भी समय-समय पर जैसी राय तुम्हारे मनमें बने, लिखते रहना । तुम्हारा पहला पत्र और गंगाबहनके दोनों पत्र उसे भेज दिये हैं। सूरजबहनकी हमने जो परीक्षा की है उसका परिणाम सूचित करना मित्र-धर्म है ।
गोशालाकी गन्दगीके बारेमें मैंने जो कहा था क्या वैसा प्रबन्ध कर दिया गया है ? क्या कुआँ साफ करनेसे पानी कुछ ठीक हुआ ? अब क्या रोटी ठीक बनती है ?
कृष्णदास कल आ गया। छोटालालको भेज देनेके लिए आज तार भेजा है । वह आ जाये तो दोनोंको अल्मोड़ा मेज दूंगा । उत्तमचन्दकी जगह इस समय दोनोंको