सारांश, अमेरिकाके अन्धे किसी पर भाररूप नहीं हैं, उलटे कई तरहके काम करके वे अपनी जीविका आप कमा लेते हैं ।
तारदेवमें शिक्षा पाये हुए अन्धे समामें लाये गये थे। उन्होंने गाना गाया । एकने हारमोनियम बजाया, दूसरेने तबला । किसीने अन्धोंके लिए खास तौर पर बनाई गई उठे हुए अक्षरोंकी पुस्तकका कुछ अंश पढ़ कर सुनाया, तो किसी दूसरेने लिख- कर बताया और तीसरेने सुई में धागा पिरोकर दिखाया । अन्धोंने आँखोंसे सम्बन्ध रखनेवाले जो काम किये थे, वे भी प्रस्तुत किये गये थे ।
इस संस्थाका कहना इस प्रकार है :
१. संस्थाको चलानेके लिए धनी लोग द्रव्य देकर सहायता करें।
२. अन्धों को कोई भीख न दे। जो अन्धे मिलें उन्हें संस्थाके स्थानमें भेज देनेसे उनकी योग्य सुश्रूषा की जायेगी और अगर उनकी आँख ठीक होने योग्य प्रतीत होगी तो चिकित्सा भी की जायेगी ।
३. अन्धोंको जो रकम आजकल भीखमें दी जाती है, उसे उस रूपमें न देकर दानी लोग अपनी बचत या उसका अंश इस संस्थाके पास भेज दें ।
४. जिनके पास धन नहीं है, मगर जिनके हृदय में ऐसे अपंगोंके लिए दया है वे जहाँ-कहीं इन्हें देखें धीरज देकर समझाएँ और इस संस्थामें भेज दें । संस्था उनकी जाँच करेंगी ।
अगर हममें स्वराज्यकी सच्ची भावना पैदा हो जाये तो अन्धोंको भी उससे थोड़ा ढाढ़स जरूर बँधने लगे । अन्धोंका दुःख मिटानेके लिए स्वराज्य तक रुकनेकी जरूरत नहीं है । स्वराज्य सूर्य अपने पूर्ण उदयसे पहले ही अपनी गर्मी और प्रकाश चारों ओर फैला देता है । मेरी सूचना पर अमल करनेमें न तो समयका व्यय होता है, न शक्तिका क्षय ही । स्वराज्य भावनाका मतलब तो यह है कि हममें अपनी आजादी के लिए जितना जोश है, उतना ही जोश भारतके तमाम अन्धों, लूलों, लँगड़ों और निर्बलोंकी आजादी और अच्छाईके लिए हमारी नसोंमें बहता हो। जिसका इस तरह हृदय परिवर्तन हो गया है, वह दुखियों की सेवाका एक भी मौका हाथसे नहीं जाने देगा ।
नवजीवन, १५-९-१९२९