टिप्पणियाँ
स्त्री-सेवाके आश्रमका शिलारोपण समाप्त होनेके बाद मुझे विले पार्लेकी गुजरात विद्यापीठसे सम्बद्ध राष्ट्रीय पाठशालामें उद्योग-मन्दिर और खादी प्रदर्शनीका उद्घाटन करना था । यह शाला बड़ी मुसीबत में है, और श्री गोकुलभाई वगैरा सेवकोंकी एक- निष्ठा और दृढ़ता के कारण ही अवतक टिक सकी है। खर्च घटानेके इरादेसे शाला विलेपार्लेमें लाई गई है । आजकल इस शालाके प्रणेता भाई किशोरलाल मशरूवाला हैं । इस शाला में उद्योगोंको अमली तौर पर प्रधानपद देनेका प्रयत्न किया जा रहा है, और उद्योगों में प्रधान उद्योग तो चरखे एवं खादीका ही है; इस कामके लिए एक मन्दिरकी आवश्यकता थी । मन्दिर अब बन चुका है । उसीमें एक नन्ही-सी खादी प्रदर्शनी की गई थी।
अविवेकी और उथला विचार करनेवाले शायद ऐसा कहें कि कहाँ यह बकरी और कहाँ सरकारी शाला-रूपी सिंह; यह जानते हुए भी कि एक सिंह अनेक छोटी- बड़ी बकरियोंको खा जाता है, राष्ट्रीय शालाका मोह रखना मूर्खताकी पराकाष्ठा ही है। मगर इससे राष्ट्रीय शिक्षाके पुजारियोंको निराश होने या डरनेका कोई कारण नहीं है ।
राष्ट्रीय शाला और सरकारी शालाकी परस्पर तुलना की ही नहीं जा सकती । जबतक देशमें राष्ट्रीयताका पूरा-पूरा प्रेम पैदा न होगा, उसके गुणोंका सम्पूर्ण पृथक्करण न होगा, तबतक राष्ट्रीय शालाओंकी भी पूरी-पूरी कद्र न हो पायेगी । लेकिन केवल इसीलिए राष्ट्रीयताके जानकार अपने ज्ञानके विषयमें सशंक क्यों हों ? यहाँ राष्ट्रीय शालाकी विशेषता समझ लेना आवश्यक है; वह विशेषता यह है कि उसमें पहला और आखिरी सबक देशप्रेम, देशसेवा और देशके लिए यज्ञ करनेका पढ़ाया जाता | सरकारी शालाओंमें देशप्रेम विदेशी शासनके प्रति वफादारीके आधीन है। यह कौन नहीं जानता कि जब दोनोंमें विरोध खड़ा हो जाता है तो सरकारी मदरसोंमें विदेशी शासनकी रक्षाको ही प्रधानपद दिया जाता है । अतः जो राष्ट्रके भक्त हैं, वे सरकारी शाला-रूपी महलों की अपेक्षा राष्ट्रीय शाला-रूपी झोंपड़ियोंको ही अधिक पसन्द करेंगे । क्या जगत् में कोई ऐसा है जो अपने खण्डहर, जर्जर और बरसातमें चूनेवाले झोंपड़ेकी अपेक्षा महलोंके समान सुन्दर और सब तरहकी भौतिक सुविधाओंसे पूर्ण कारागृहकी पराधीनताको पसन्द करेगा ? अगर हमने मोह और स्वार्थके वश होकर सरकारी और राष्ट्रीय शाला के बीचके इस निर्णयात्मक भेदको भुला न दिया होता तो आज राष्ट्रीय शाला में इने-गिने बालकोंके बदले असंख्य बालक पढ़ते होते और उनके लिए सुन्दर इमारतें बना देनेको हरएक धनाढ्य एक-दूसरेसे स्पर्धा करता होता । भले ही राष्ट्रीय शालाओंका काम बरगदको छायामें होता हो और उनमें मुट्ठी भर छात्र ही क्यों न पढ़ते हों, फिर भी राष्ट्रीय शिक्षकोंसे प्रार्थना है कि वे अपनी श्रद्धासे न डिगें । मेरा विश्वास है कि ऐसी शालाओं में विले पार्लेका भी अपना स्थान है और इसी कारण वहाँ जाकर मैंने अपनेको कृतकृत्य समझा था ।