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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५०२

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३७०. पत्र : कन्नूमलको

मुकाम आगरा
१७ सितम्बर, १९२९

प्रिय मित्र,

मुझे खेद है कि जब आप आये, मैं आपसे नहीं मिल सका, क्योंकि तब मैं सोने ही जा रहा था। मुझे अब आपकी भेजी पुस्तकें मिल गई हैं। तदर्थ धन्यवाद। मुझे भेजी गई पुस्तकोंकी मूल्य-सूची नहीं दिखी और न पुस्तकोंपर ही मूल्य दिया गया है। उदाहरण के लिए हिन्दी पुस्तक 'कबीर वचनावली' पर, जिसे मैंने अभी-अभी देखा है, मूल्य नहीं लिखा है।

हृदयसे आपका,

लाला कन्नूमल
धौलपुर (राजपूताना)
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५५५१) की माइक्रोफिल्मसे।
 

३७१. पत्र : वी॰ वी॰ दीक्षितको

मुकाम आगरा
१७ सितम्बर, १९२९

प्रिय मित्र,

श्री शेषगिरि रावके पत्रके साथ आपका पत्र मिला। आरम्भ में मैं यह सुझाव देना चाहूँगा कि उनकी मशीन एल्लौरके श्री नारायण राजूको जो चरखके बारेमें कुछ जानकारी रखते हैं, दिखा लो जाये। यदि वे अपने आविष्कारके बारेमें पूर्णतः आश्वस्त हैं तो वे अपनी मशीन जाँच-पड़तालके लिए साबरमती भेज दें। यदि मशीन थोड़ी भी उपयोगी प्रतीत हुई तो उन्हें उनकी कल्पनाके अनुसार ठीक प्रकारकी मशीन तैयार करनेमें यथासम्भव पूरी सहायता दी जायेगी। मशीनके सन्तोषप्रद साबित न होनेकी स्थिति में यदि वे मशीनको वापस मँगा लेना चाहेंगे तो उसके साबरमती भेजने और वापसी का खर्चा देना होगा, अगर वे स्वयं आते हैं तो साबरमती में उनके ठहरने और भोजन आदिकी व्यवस्था उद्योग मन्दिर करेगा। मैं श्री रावको अलगसे पत्र नहीं लिख रहा हूँ। यही पत्र मेरे द्वारा उनके पत्रकी प्राप्तिकी सूचना माना जाये।

हृदयसे आपका,

श्रीयुत वी॰ वी॰ दीक्षित

एल्लौर

पश्चिमी गोदावरी जिला
अंग्रेजी (१५५८) की माइक्रोफिल्मसे।