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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५०५

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३७४. पत्र : जगन्नाथको

मुकाम आगरा
१७ सितम्बर, १९२९

प्रिय जगन्नाथ,

देर आयद दुरुस्त आयद। रिपोर्ट देने में इतनी देरी करते चले जानेके कारण मैं मन-ही-मन तुमपर उबलता रहा हूँ। जब तुम टण्डनजी के साथ पिछली बार आश्रम आये तो मैंने सोचा कि तुम मुझे रिपोर्ट तत्काल दे दोगे। अब तुम देख सकते हो कि उसे भेजनेमें तुमने कितना समय लगाया। फिर भी इस बातसे त्रुटिकी कुछ पूर्ति हो जाती है कि रिपोर्ट काफी विस्तृत है; मैं इसे ध्यानपूर्वक पढ़ रहा हूँ। देशराजको लिखा मेरा पत्र[]संलग्न है। कृपया वह उन्हें पहुँचा दें। मैं जहाँ तक सम्भव है अपने स्वास्थ्यको ठीक रखनेका प्रयत्न कर रहा हूँ ।

हृदयसे तुम्हारा,

संलग्न : दौरेका कार्यक्रम[]
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५५४१)की माइक्रोफिल्मसे।
 

३७५. पत्र : एवलिन गैजको

मुकाम आगरा
१७ सितम्बर, १९२९

प्रिय बहन,

तुम्हारा पत्र मिला। कार्नेलियसको तत्काल लिख रहा हूँ। यद्यपि श्री वर्जिसके नाम उनके पत्रसे मुझे शंका भी होती है तथापि मुझे आशा है कि मेरे पत्र-व्यवहारका परिणाम सुखद होगा। बातचीतके दौरान तुमने मुझसे कहा था कि मैं तुम्हारा नाम न बताऊँ, किन्तु मेरे विचार में तुम्हारे नामका उल्लेख न करना गलती होगी। कार्नेलियसको यह तो मालूम ही हो जाना चाहिए कि मुझे जानकारी देनेवाला कौन है। अनुमान लगाते रहनेका अवसर न देना ही ठीक होगा। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि तुम्हारा नाम लिख देना ठीक है। हमारी बातचीत में मैं यह नहीं

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