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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५२४

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३९४. पत्र : राधा गांधीको

आगरा
१९ सितम्बर, १९२९

चि० राधा,

आजकल मुझे अपना काम ज्यादातर पत्र बोलकर लिखवानेसे चलाना पड़ता है, क्योंकि यदि आराम भी लेना हो और काम भी करना हो तो खाते हुए और चरखा चलाते हुए पत्र लिखवा डालने चाहिए। तुम्हें बुखार क्यों आ गया? मनु चली गई, कोई बात नहीं। सन्तोकके आ जाने पर उससे कहो कि वह मुझे तफसीलसे लिखे।

उमियाके बारेमें जल्दीसे-जल्दी निर्णय कर लेना चाहता हूँ। अगर वह अपनी गुजराती थोड़ी और अच्छी कर ले, तो बहुत अच्छा हो । तू इस विषय में उसे लिखती रहना। रुकमिणीकी तबीयत कैसी है? तुम दोनों बहनों को जब-जब सेवा करनेका कोई प्रसंग मिल जाये, तब-तब उसे बहुत अच्छी तरहसे और खूब नम्रतापूर्वक किया करना।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८६७६) से।

सौजन्य : राधाबहन चौधरी

 

३९५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको

आगरा
१९ सितम्बर, १९२९

चि० प्रेमा,

तेरा पत्र मिला। विश्वस्त होकर मैंने 'तुम' की जगह 'तू' का प्रयोग किया है। तूने मुझे विस्तृत उत्तर लिखकर अच्छा ही किया। काममें लगा हुआ पिता एक ही लकीर लिखे, तो भी बच्चे सन्तोष कर लेते हैं; लेकिन वे तो अपना हृदय पूरा उँडेलेंगे ही।

यह बात बिलकुल सच है कि मेरे जाल में जो भी आ जाये उसे फँसा लेनेकी ही मेरी इच्छा रहती है। किसीके जालमें फँसकर हमारा सत्यानाश हो सकता है। लेकिन मेरे जाल में फँसकर किसी भी व्यक्तिका सत्यानाश हुआ हो,