इस तरह की लापरवाहीके कारण तीर्थस्थानोंकी हवा दूषित हो जाती है और पानी कीटाणुयुक्त हो जाता है। ऐसी हालत में अगर तत्काल ही हैजा, टाइफाइड (आन्त्र-ज्वर) वगैरा छूतसे फैलनेवाले रोग उत्पन्न हो जायें तो आश्चर्य ही क्या? हैजेकी बुनियाद ही गन्दे पानीमें है। टाइफाइडके बारेमें भी बहुत हद तक यही कहा जा सकता है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि करीब ७५ फीसदी रोग हमारी गन्दगीके कारण फैलते हैं।
इसलिए ग्राम-सेवकोंका पहला धर्म देहातवालोंको सफाईसे रहना सिखाना है। इस तरह की शिक्षाके लिए व्याख्यानों या पत्रिकाओंसे बहुत काम नहीं चलता। गाँववाले स्वयंसेवककी बातें सुनना पसन्द नहीं करते, अगर सुनते भी हैं तो तदनुसार काम करनेका उत्साह नहीं रखते। पत्रिकाएँ बाँटने पर उन्हें कभी पढ़ते नहीं, अनेकोंको तो पढ़ना आता ही नहीं है और सच्ची जिज्ञासाके अभाव में जो पढ़ना जानता है, वह दूसरोंको पढ़ाता या पढ़कर नहीं सुनाता।
अतएव स्वयंसेवकका तो यह कर्त्तव्य हुआ कि वह गाँववालोंके सामने प्रत्यक्ष उदाहरण रखे। उन्हें पदार्थपाठ दे। जो काम गाँववालोंसे कराने हैं, उन्हें वह स्वयं करके बताये, तभी गाँववाले उस ओर रुजू होंगे। कोई यह शंका न करे कि उस हालत में भी वे काम नहीं करेंगे-जरूर करेंगे। फिर भी स्वयंसेवकके लिए धैर्यकी जरूरत तो होगी ही। यह मानना निराधार होगा कि हमारी दो दिनकी सेवासे लोग अपने-आप सब काम करने लगेंगे।
स्वयंसेवक पहले गाँववालोंको इकट्ठा करके उन्हें उनका धर्म समझायें। बादमें उन लोगों में से कोई कामके लिए आगे आये या न आये वह खुद सफाईका काम शुरू कर दे। उसे गांव मेंसे ही फावड़ा, टोकरी, बाल्टी, झाड़ और कुदाली वगैरा चीजें जुटा लेनी चाहिए। लोगों को इस बातका विश्वास दिला देने पर कि उनकी चीजें उन्हें वापस मिल जायेंगी, यह सम्भव नहीं कि वे ये वस्तुएँ देनेसे इनकार कर दें।
इसके बाद स्वयंसेवक रास्तों और गलियोंकी जाँच करेगा और जहाँ मलमूत्र दीख पड़ेगा, उस जगहको साफ कर देगा, मैलेको फावड़ेकी मददसे टोकरीमें भर लेगा और उस स्थानको सूखी मिट्टी से ढँक देगा। जहाँ पेशाब होगा, वहाँकी गीली मिट्टीको फावड़ेसे उसी टोकरी में भर लेगा और आसपास तथा उस जगह पर दूसरी साफ और सूखी मिट्टी फैला देगा। अगर पास ही कूड़ा-करकट होगा तो उसे झाड़से इकट्ठा करके एक ओर ढेर बना देगा और मैलेको ठिकाने पहुँचाने के बाद उसी टोकरी में कूड़ा-करकट भी भरकर ले जायेगा।
यह एक महत्त्वका सवाल है कि मैला और कूड़ा-करकट कहाँ डाला जाये। सवाल सफाईसे सम्बन्ध रखता है और अर्थपूर्ण है। बाहर-खुले में-पड़ा हुआ मैला बदबू फैलाता है। उसपर मक्खियाँ बैठती हैं और फिर वही हमारे शरीरों पर या खाने-पीने की चीजों पर बैठकर रोगके कीटाणुओंको चारों और फैला देती हैं। अगर हम मक्खियोंकी इस क्रियाको सूक्ष्मदर्शक यन्त्रसे देखें तो अवश्य ही जिन मिठाइयोंको हम आज बड़ी तादादमें खाते-पीते हैं उनको हमेशाके लिए छोड़ दें।