मैला किसानोंके लिए सोना है। उसे खेत में डालनेसे वह सुन्दर खादका काम देता है और खेतकी उपजाऊ-शक्तिको खूब बढ़ाता है। चीनी लोग इस काम में सबसे अधिक चतुर हैं। कहा जाता है कि वे मलमूत्रका सोनेके समान संग्रह करते और उससे करोड़ों रुपयोंकी बचत कर लेते हैं; साथ ही अनेक तरहके रोगोंसे भी बच जाते हैं।
अतएव स्वयंसेवक किसानोंको यह बात समझाये और जो किसान इजाजत दें उनके खेतों में मलमूत्र वगैरा गाड़ दें। अगर कोई किसान अज्ञानवश स्वयंसेवककी उपेक्षा करे तो स्वयंसेवक मैलेको घूरेके पास ही कहीं गाड़ दे। इतना कर चुकने पर वह उस कूड़े-करकटके ढेरके पास जाये।
कूड़ा-करकट दो तरहका होता है। एक खादके योग्य, जैसे कि शाकपातके छिलके, डंठल, अनाज, घास वगैरा। दूसरा, कचरा, लकड़ी, पत्थर, पतरे वगैरा। इनमें से जो कूड़ा-करकट खादके योग्य है उसे खेत में या जहाँ उसका खाद इकट्ठा किया जा सके, रखना चाहिए। और दूसरेको गड्ढे वगैरा पूरनेमें लगा देना चाहिए। इस तरह गाँव साफ रहेगा और नंगे पैर चलनेवाले भी बिना किसी खतरेके चल-फिर सकेंगे। कुछ दिनोंकी मेहनत के बाद अवश्य ही लोग इस कामकी कीमत परखने लगेंगे। जब समझेंगे तब वे इसमें मदद करने लगेंगे और फिर तो खुद ही यह भार उठा लेंगे। अगर हरएक किसान अपने और अपने कुटुम्बियोंके मल-मूत्रका खेतके लिए उपयोग करेगा तो किसीको किसीका बोझ नहीं मालूम पड़ेगा और सब अपनी-अपनी फसल में उत्तरोत्तर उन्नति होते देखेंगे।
रास्तेमें पाखाना फिरने की आदत तो होनी ही न चाहिए। खुलेमें सब किसी के देखते हुए पाखाना फिरना या बच्चोंको फिरने देना भी असभ्यताका चिह्न है। और इस असभ्यताका भान तो हमें बना ही रहता है, क्योंकि ऐसे समय जब कोई आ जाता है, हम सिर नीचे झुका लेते हैं। अतएव हरएक गाँव में किसी एक जगह पर बहुत कम खर्च में पाखाने बनवाने चाहिए। घूरे इस काममें आ सकते हैं। इस तरह एकत्र खादको किसान आपसमें बाँट सकते हैं। जबतक किसान स्वयं इस ढंगका इन्तजाम न करने लगें, तबतक स्वयंसेवकको घूरोंकी सफाई भी रखनी पड़ेगी। रोज सबेरे जब गाँववाले घूरेका उपयोग कर चुकें तब स्वयंसेवक किसी नियत समय पर घूरे पर जायें और तमाम मैलेको इकट्ठा करके ऊपर कहे अनुसार उसको ठिकाने पहुँचा दें। अगर खेत न मिले तो जहाँ-जहाँ मैला गाड़ा हो, वहाँ कुछ निशान बना देना चाहिए। इससे रोज-रोज गाड़ते समय सुभीता होगा और जब किसान इसकी उपयोगिता समझने लगेंगे तब वे इस एकत्र खादका इस्तेमाल कर सकेंगे।
मैला बहुत गहरा नहीं गाड़ना चाहिए। पृथ्वीके नौ इंच गहरे भागमें अनेक परोपकारी जन्तु रहते हैं। इस गहराईमें उनका काम तमाम मैलेको शुद्ध करना और उसे खादमें बदल देना होता है। सूर्यकी किरणें भी रामके दूतकी भाँति अद्भुत सेवा करती हैं। जिसे इस बातकी जाँच करनी हो वह स्वयं अनुभव द्वारा कर सकता है। कुछ मैला नौ इंचकी गहराई में गाड़ दें और एक सप्ताह बाद उस जमीनको खोद