सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५३३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४९५
पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको

जितना खाती है, उससे कम देती है। इस कारण बहुतेरे लोग अज्ञानवश उदासीन होकर गायके बदले भैंसका दूध पीने लगते हैं। कत्ल होनेके लिए बेशुमार गायें आस्ट्रेलिया रवाना की जाती हैं। बहुसंख्यक गायें भारतमें ही कत्ल की जाती हैं और उनका मांस ब्रह्मदेशको भेजा जाता है। दूसरी बेशुमार गायें बेमौत मर जाती हैं। बेमौत मरनेवाली गायोंकी संख्या तो किसीके पास नहीं है। शेष जो जिन्दा रहती हैं वे जिन्दा रहकर भी मरी हुई-सी होती हैं। पूरा दूध नहीं देतीं, इसी कारण पेट-भर चारा भी उन्हें नहीं मिलता।

अगर हम पर धर्म-विषयक शिथिलताने प्रभुत्व न जमा लिया हो, धर्मके सम्बन्धमें हम लापरवाह न बन गये हों, तो हमें अन्य शास्त्रोंकी तरह गोसेवा-शास्त्रका मी अभ्यास करना चाहिए और पुराने वहमों तथा पुराने रिवाजोंको, जो आज बेकाम अथवा हानिकारक हो चुके हैं, छोड़ देना चाहिए।

इसी कारण वर्षों पहले मैं तो इस निश्चय पर पहुँच चुका था कि जो बछड़े उत्तम गाय पैदा करने लायक उम्दा नस्लके न हों उन सबको बचपनमें बधिया करके बैल बनाना चाहिए और दूसरोंको भी इसीकी प्रेरणा देनी चाहिए। प्रत्येक गोसेवक का यही धर्म है। कल्पित अथवा आदर्श लेकिन अशक्य धर्मके नाम पर समयानुकूल आवश्यक धर्मकी उपेक्षा करना पाप है।

[ गुजरातीसे ]
नवजीवन, २२-९-१९२९
 

४०२. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको

२२ सितम्बर, १९२९

चि० मथुरादास,

तुमने कठिन व्रत ले लिया है। किन्तु ले लिया, यह ठीक किया। ईश्वर तुम्हारी सहायता करे। क्रोध जीतना ऐसा सरल नहीं है और कई बार तो क्रोध व्याप्त हो गया है, इसका ध्यान भी नहीं रहता। किन्तु प्रयत्नसे बहुत-कुछ हो जाता है। हम तो प्रयत्न ही करें।

बापूके आशीर्वाद

तुम्हारा शरीर अच्छा होगा।

गुजराती (जी० एन० ३७३१) की फोटो-नकलसे।