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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५३४

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४०३. पत्र : छगनलाल जोशीको

कानपुर
[२२ सितम्बर, १९२९][]

चि० छगनलाल,

आज साढ़े ग्यारह बजे कानपुर पहुँच गये। यहाँसे डाक जल्दी जाती। यदि पत्र आज ही डाकमें छोड़ने हों, छोड़ने तो हैं ही, इसलिए थोड़े में ही लिखूँगा। रमणीकलाल मिलने आ पहुँचा है। उसकी तबीयत काफी अच्छी है। इस तरह अलग-अलग समय कुछ लोगोंको आश्रमसे भेजने में फायदा है, यह हमने देख लिया है।

आश्रमकी चिन्ता कर्त्तव्यपरायण व्यक्तिको धीरे-धीरे खा जाती है। और जबतक हम अपने-आपको अनासक्त नहीं बना पाते तबतक ऐसा होता ही रहेगा।

तुम्हारी तरफ से आनेवाली डाकमें पत्र फिरसे लापरवाहीसे बँधे हुए होते हैं। डोरी इतनी मजबूती तथा सख्ती से बँधी होनी चाहिए कि उसमें से एक भी पत्र खिसक न सके। यह डोरी तो मानो शोभाके लिए बँधी हुई थी। लिफाफा फटा हुआ था और इसलिए यदि उसमेंसे कोई पत्र निकालना चाहे, निकाल सकता था। इसका ख्याल करना। बाँधनेवाला इस कामको अच्छी तरह सीख ले। गंगाबहनको पत्र लिख रहा हूँ। बाकी कलकी डाकसे।

बापूके आशीर्वाद

[ गुजराती से ]
बापुना पत्रो - ७ : श्री छगनलाल जोशीने
 

४०४. भाषण : कानपुरमें[]

२२ सितम्बर, १९२९

गांधीजी ने अपने भाषणमें शालाओंमें कताईको सफल बनानेके लिए तीन आवश्यक शर्तोंकी ओर बोर्डका ध्यान खींचा था, वे शर्ते यों थीं : कताईकी समुचित शिक्षा और उसके संगठन के लिए हरएक शाला में एक चरखा-शास्त्री नियुक्त किया जाये। शाला में नियुक्त साधारण शिक्षकोंके वेतन में थोड़ी वृद्धि करनेसे ही यह काम सीख

  1. साधन-सूत्र के अनुसार।
  2. यह भाषण जिला बोर्ड और नगरपालिकाकी ओरसे दिये गये अभिनन्दनके उत्तर में था। जिला बोर्डने कहा था कि उसने अपनी शालाओं में कताईको अनिवार्य कर दिया है और दूधको समस्याको हल करने की दृष्टिसे पैंतीस हजार रुपयोंकी रकम लगाई है। यह विवरण "संयुक्त प्रान्तकी यात्रा-३" के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ था।