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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५३६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

मैं जानता हूँ कि आज आप इस कामके लिए तैयार नहीं हैं। अतएव आज तो मैं आपसे यही प्रार्थना करूँगा कि आप भारतके गरीबों पर तरस खाकर नहीं, बल्कि आपने उन्हें जो हानि पहुँचाई है उसके प्रायश्चित्त-स्वरूप खुले हाथों, निधिके लिए द्रव्य दें।

हिन्दी नवजीवन, १०-१०-१९२९
 

४०६. पत्र : महादेव देसाईको

२२ सितम्बर, १९२९

चि० महादेव,

तुम्हारे पत्र मिलते रहते हैं। इस बार तो मैं तुम्हें बिलकुल ही नहीं लिख सका। जिसे बिना लिखे चल ही नहीं सकता था, उसीको लिखकर सन्तोष किया और काफी समय बचा लिया। यह पत्र तो लिख ही रहा हूँ। मौन लेकर लिखने बैठा हूँ। इस समय रातके नौ बजे हैं।

तुमने काफी कतरनें भेज दी हैं। एकको छोड़कर और किसीको नहीं पढ़ा। जतीनके[]बारेमें अभी तो कुछ नहीं लिखा जा सकता। जो हमारा अपना मण्डल कहलाता है, वह भी मुझे नहीं समझ पा रहा है, उसमें मुझे अनोखा कुछ नहीं लगता। मेरे अभिप्रायके ठीक होनेके बारेमें मुझे तो तनिक भी शंका नहीं है। मैं इस आन्दोलनको श्रेयस्कर नहीं मानता। मौन इसलिए रहना पड़ रहा है कि यदि बोलूँ तो उसका दुरुपयोग होगा। फिर भी लगता है कि लोग मेरी स्थिति समझ गये हैं। किसीने मेरी राय नहीं मांगी है। अखबारवाले जरूर माँगते हैं, किन्तु मैं उसे नहीं गिनता।

तुमने वल्लभभाईके विषयमें जो लिखा है वह मुझे ठीक नहीं जान पड़ता। उन्हें फिलहाल अध्यक्ष बनाना बाल निगलने-जैसा है। फिर भी तुम सब लखनऊ आनेवाले ही हो, तब इसपर विशेष विचार करेंगे। मैं तो इस बारेमें कुछ भी नहीं सोच रहा हूँ। समय आने पर ईश्वर मददके लिए आयेगा ही। कोई मुझे परेशान भी नहीं कर रहा है।

मद्रास में वल्लभभाईने शानदार काम किया। कर्नाटक इत्यादिके विषयमें तो जब तुम बताओगे, तब पता चलेगा। 'नवजीवन' और 'यंग इंडिया' में तुम्हारे लेख पढ़े। वे ठीक मालूम पड़े हैं।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (एस० एन० ११४५५) की फोटो-नकलसे।

  1. पतीन्द्रनाथदास।