आप भारत के इस सपूतकी अविस्मरणीय सेवाके पात्र बनने की दिशामें क्या-कुछ कर रहे हैं। उनकी अपेक्षा आपसे घुरन्धर साहित्य-महारथी बन जानेकी नहीं है; वे तो यह चाहते हैं कि आप अपने जीवन में सच्चे धर्मको उतारकर हिन्दू धर्म और देशकी रक्षा करें। ... याद रखिए कि मालवीयजी की यह सबसे बड़ी कृति इमारतोंके आलीशान होने अथवा १३०० एकड़के जिस क्षेत्रमें बनी है उसके कारण नहीं बल्कि आप क्या बनते हैं, इस आधारपर परखी जायेगी। ... यदि आपके अपने चरित्रमें अपेक्षित पवित्रता प्रकाशित होती है तो यह आप किसी अन्य माध्यमसे उस हद तक प्रकाशित नहीं कर सकते जिस हद तक चरखेको अपनाकर कर सकते हैं। प्रभुके अनन्त नामों में कुछ इनेगिने धनवान लोगोंसे भिन्न करोड़ों लोगोंको सूचित करनेवाला नाम दरिद्रनारायण सर्वाधिक पवित्र है। इन भूख से मर रहे करोड़ों लोगोंसे थोड़े-बहुत एकरूप होने का सबसे सरल और उत्तम उपाय मेरे द्वारा बताई गई विविध पद्धतियोंसे चरखेका सन्देश फैलाना ही है। कुशल कातनेवाला बनकर, खादी को अपनाकर और उसके लिए आर्थिक मदद देकर यह सन्देश फैलाया जा सकता है। याद रखिए कि मालवीयजी ने जो सुविधाएँ आपके लिए मुहैया कर दी हैं वे इस अनन्त जन-समुदायको प्राप्त हो ही नहीं सकतीं। तब फिर आप अपने इन भाई-बहनोंको बदले में क्या देनेवाले हैं ?[१]
चरखा छोटा-सा यन्त्र है, पर मेरी दृष्टिसे इसका बड़ा महत्त्व है। मेरे चरखेकी बात आप मानें या न मानें, पर चरखेमें मेरी श्रद्धा तो बढ़ती ही जा रही है। आपके यहाँ इतना बड़ा मकान है। आप जो कुछ सुविधाएँ चाहें, यहाँ मिल सकती हैं। यहाँ ऐसे भी विद्यार्थी हैं जिनसे कुछ फीस नहीं ली जाती। ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मालवीयजी महाराज पैसे भी दे देते हैं। छात्र और छात्राओंके लिए जो एक महापुरुष कर सकता है वह मालवीयजी कर रहे हैं।
जहाँ आप ऐसी हालत में हैं वहाँ दूसरी तरफ करोड़ों आदमियोंको २४ घंटे में एक बार रूखी रोटी और मैले नमकके सिवा कुछ नहीं मिलता। जगन्नाथजी में लोग भूखों मर रहे हैं। उनकी आँखोंमें तेज नहीं है। उनकी एक-एक हड्डी गिनी जा सकती है। मैं किसी भूतकालकी चर्चा नहीं कर रहा हूँ, बल्कि वर्तमान समयकी ही बात सुना रहा हूँ। एक तरफ लोग पेट-भर खाते हैं, इतना ज्यादा खाते हैं कि उन्हें डाक्टरों और हकीमोंकी जरूरत पड़ती है। दूसरी ओर लोग भूखों मर रहे हैं। मैं आपसे पूछता हूँ कि आप इन भूखे मरनेवालोंके लिए क्या करते हैं। क्या आपके हृदयमें इन अस्थि-पंजरोंके लिए कोई स्थान है?
ईश्वरका सबसे अच्छा नाम दरिद्रनारायण है। विश्वनाथजी के दर्शन में जबतक एक भी आदमीका निषेध बना है तबतक वहाँ ईश्वरका वास नहीं हो सकता। वहाँ अस्पृश्य प्रवेश नहीं कर सकता। अगर अस्पृश्य विश्वनाथजी[के मन्दिर] में जा सकें और 'ईश्वर' की कृपा हो जाये तो उनकी हड्डियाँ बची रह जायें। अगर आप ईश्वरका साक्षात्कार करना चाहते हों तो दरिद्रनारायणकी सेवा करें। आपने १२८६ रुपये मुझे
- ↑ इस अनुच्छेदका मिलान यंग इंडिया, १०-१०-१९२९ में "प्रकाशित संयुक्त प्रान्तकी यात्रा -४" के विवरणसे कर लिया गया है।