यह कहते हुए आरम्भ किया कि राष्ट्रीय शिक्षाके प्रति उनका विश्वास दिनोंदिन बढ़ रहा है। उन्होंने इस बात पर पूर्ण आस्था प्रकट की कि राष्ट्रीय संस्थान से बाहर निकलने पर ये विद्यार्थी अपनी योग्यताका पूरा-पूरा परिचय देंगे और स्वाधीनताके युद्धकी बागडोर सँभालेंगे। उन्होंने कहा :[१]
आज मैं आप लोगोंसे यहाँ कोई नई चीज कहनेके लिए नहीं आया हूँ। और मेरे पास कोई नई चीज है भी नहीं। मैं ऐसे समय पर जो कुछ कहता आया हूँ करीब-करीब वही इस समय भी कहना चाहता हूँ। भाषामें भेद भले ही पड़े, बात वही होगी। मेरा विश्वास दिन-प्रतिदिन राष्ट्रीय शिक्षा और राष्ट्रीय विद्यालयोंमें बढ़ता जाता है। मैं भारतमें भ्रमण करते हुए सभी राष्ट्रीय विद्यापीठोंसे परिचित हो चुका हूँ। इस समय राष्ट्रीय विद्यालय और विद्यापीठ बहुत कम हैं; जितने हैं उनमें काशी विद्यापीठ एक बड़ी संस्था है। संख्याकी दृष्टिसे नहीं, प्रयत्न और गुणकी दृष्टिसे। इसके लिए किये गये प्रयत्नके साक्षी मुझसे बढ़कर आप ही लोग हैं।
वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षाका आरम्भ सन् १९२० से हुआ था। यह मैं नहीं कहता कि इसके पहले राष्ट्रीय विद्यालय नहीं थे; परन्तु मैं इस समय उन्हीं राष्ट्रीय विद्यालयोंकी बात कह रहा हूँ जिनकी नींव असहयोग आन्दोलनके जमाने में डाली गई थी। जो कल्पना सन् १९२०में इन राष्ट्रीय विद्यालयोंके लिए की गई थी उसमें पहले के राष्ट्रीय विद्यालयोंकी कल्पनासे कुछ भेद था। इस कल्पनाको ध्यान में रखकर चलनेवाले हम थोड़े ही हैं और तदनुसार शिक्षा ग्रहण करनेवाले स्नातक भी बहुत थोड़ा हैं। मैं अपने भारत भ्रमण में राष्ट्रीय स्नातकोंसे मिलता हूँ और उनसे बातचीत करता। इससे मैं यह देख पाया हूँ कि उनमें आत्मविश्वास नहीं है। बेचारे सोचते हैं कि फँस गये हैं, इसलिए किसी तरह निभा लें, फिर किसी-न-किसी काममें लग जायें और पैसा मिले। सभी स्नातकोंको तो नहीं, मगर बहुतोंकी ऐसी दशा है। उनसे मैं दो शब्द कहना चाहता हूँ। उनको जानना चाहिए कि आत्मविश्वास खोनेका कोई कारण नहीं है। स्वराज्य के इतिहास में इन विद्यार्थियोंका दरजा छोटा नहीं रहेगा। उनका दरजा छोटा न रहे यह विद्यार्थियोंके हाथ में है। स्नातकोंको यह जो कागजका पुरजा, प्रमाणपत्र दिया गया है वह कोई बड़ी चीज नहीं है। वह तो कुलपतिके आशीर्वादकी निशानी है। उसमें प्राणप्रतिष्ठा हो गई है ऐसा मानकर आप स्नातकगण उसका संग्रह तो करें, परन्तु ऐसा हरगिज न सोचें कि उससे आजीविकाका प्रबन्ध कर लेंगे या धन पैदा करेंगे। आजीविकाका प्रबन्ध करना इन राष्ट्रीय विद्यापीठोंका ध्येय नहीं है। इससे आजीविका भी प्राप्त हो जाती है; परन्तु आप लोग समझ लें कि आप लोग आजीविकाकी प्राप्तिके भावसे इस विद्यापीठमें नहीं आते, कुछ और ही कामके विचारसे आते हैं। आप लोग राष्ट्रको अपना जीवन समर्पित करनेके लिए आते हैं, स्वराज्यका दरवाजा खोलने की शक्ति हासिल करनेके लिए आते हैं।[२]