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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५५१

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विवाहमें सादगी

भारतसे इतनी अधिक कपास परदेश न जाये तो आज बम्बई और कलकत्तेमें सट्टके नाम पर जो भयंकर और सर्वनाशी जुआ जारी है, वह भी न रहे। न जाने कब हमारे देश-प्रेमी यह सीधा-सादा राष्ट्रीय गणितशास्त्र समझेंगे और कब सदाके लिए विदेशी वस्त्रका त्याग करेंगे?

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २६-९-१९२९
 

४१८. विवाहमें सादगी

एक संवाददाताने मेरे पास कराचीके एक विवाह समारोहके समाचार भेजे हैं। कहा गया है कि वहाँके एक धनवान सेठ श्री लालचन्दजी ने अपनी १६ वर्षकी लड़की के ब्याहके मौके पर तमाम फिजूलखचियाँ बन्द कीं और विवाह समारोहको उदात्त धार्मिक रूप देकर, उस अवसर पर कमसे कम खर्च किया। समाचारोंसे पता चलता है कि सारे समारोह में दो घंटेसे ज्यादा समय नहीं लगा; वैसे आम तौर पर ब्याहके मौकों पर कई दिन तक फिजूलखचियाँ होती रहती हैं। विवाह विधिका सारा काम एक विद्वान् ब्राह्मणके हाथों कराया गया था। उन्होंने वर-कन्या द्वारा उच्चारित सभी मन्त्रोंका अर्थ भी उन्हें समझाया। मैं सेठ लालचन्द और उनकी धर्मपत्नीको भी जिन्होंने बहुत दिनोंसे इस अपेक्षित सुधारके कार्य में अपने पतिका पूरा-पूरा साथ दिया है, हृदयसे बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि देशके दूसरे धनी लोग सर्वत्र इस उदाहरणका अनुकरण करेंगे। खादी-प्रेमी यह जानकर प्रसन्न होंगे कि सेठ लालचन्द और उनकी धर्मपत्नी पक्के खादी-प्रेमी हैं और वरवधू भी खादीमें पूर्ण श्रद्धा रखते और सदा खादी पहनते हैं। यह विवाह-समारोह मुझे आगराके विद्यार्थियोंकी सभाका[] स्मरण कराता है। उन्होंने एक मित्र द्वारा दी गई इस सूचनाकी पुष्टि की थी कि संयुक्त प्रान्तके कालेजों और विद्यालयोंमें पढ़ने वाले विद्यार्थी स्वयं छोटी उम्र में ब्याह दिये जानेके लिए उत्सुक रहते हैं और एक तरहसे माता-पिताको कीमती वस्तुएँ खरीदने, फिजूलखर्ची करने एवं बड़े-बड़े भोज या बढ़िया दावतें देनेको विवश करते हैं। मेरे मित्रने कहा था कि अत्यन्त उच्च शिक्षा प्राप्त माता-पिता भी सम्पत्तिके मिथ्याभिमान से बरी नहीं हैं, और इसीलिए जहाँ तक रुपया बहानेका सम्बन्ध है, वे अनपढ़ मगर धनवान व्यापारियोंको भी मात कर देते हैं। ऐसे सब लोगोंके लिए सेठ लालचन्दजी का ताजा उदाहरण और सेठ जमनालालजी का कुछ समय पूर्वका उदाहरण एक पदार्थ-पाठ होना चाहिए, जिससे प्रेरणा लेकर वे तमाम फिजूलखचियोंसे हाथ खींच लें। किन्तु माता-पिताओं से अधिक नवयुवकोंका यह कर्त्तव्य है कि वे बाल-विवाहका जोरोंसे विरोध करें; खासकर विद्यार्थी अवस्थाके विवाहोंका तो डटकर विरोध करें और हर तरहसे तमाम फिजूलखचियाँ बन्द करवायें। विवाहकी धार्मिक विधिके

  1. देखिए “भाषण: विद्यार्थियों के समक्ष, आगरा में", १३ सितम्बर, १९२९।
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