सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५५२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
५१४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

लिए तो १०) से ज्यादाकी जरूरत नहीं होती, न होनी चाहिए और न विवाह-विधिके सिवा और किसी बातको विवाहका आवश्यक अंग ही मानना चाहिए। प्रजातन्त्रके इस जमाने में जब कि धनी-निर्धन, ऊँच-नीच आदिके भेदोंको मिटानेका प्रयत्न किया जा रहा है, धनिकोंका यह कर्त्तव्य है कि वे अपने भोग-विलास और आमोद-प्रमोदों पर अंकुश रखकर गरीबोंको सन्तोषी जीवन बितानेका अवसर दें और 'भगवद्गीता' के 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः'[]कथनको याद रखें। बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं, जनसाधारण उसीको आदर्श मानकर चलते हैं। इस कथनकी सचाई हम अपने रात-दिनके व्यवहारमें प्रतिपल अनुभव करते हैं, खासकर विवाहके अवसरों और मृत्युके बादकी क्रियाओं में। केवल यह अनुकरण ही हजारों गरीब लोगोंके जीवन में आवश्यक वस्तुओंके अभाव और सर्वनाशकारी ब्याजकी दरों पर लिये गये ऋण-भारसे जिन्दगी-भर दबे रहनेका कारण बना बैठा है, राष्ट्रीय शक्ति और साधनों का यह अमित दुरुपयोग सहज ही रोका जा सकता है, बशर्ते कि देशके नौजवान, खासकर लक्ष्मीपुत्र, अपने लिए होनेवाली हर तरहकी फिजूलखर्चीके कट्टर दुश्मन और विरोधी बन जायें।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २६-९-१९२९
 

४१९. बुद्धि बनाम श्रद्धा

एक पत्रलेखकने मुझे 'प्रबुद्ध भारत' का सितम्बरका अंक भेजा है। इस अंकमें सम्पादकने मेरे उस उत्तरका प्रतिवाद प्रकाशित किया है, जो मैंने हाल ही में प्रकाशित उनकी लेख-माला "चरखा और खादी विचार" के सम्बन्धमें लिखा था। अगर इस प्रतिवादसे सम्पादक सन्तुष्ट हैं और पाठकोंको भी सन्तोष होता है तो ठीक है; मैं और तर्क नहीं देना चाहता तथा अन्तिम निर्णय समय और अनुभव पर छोड़ता हूँ। लेकिन सम्पादक महोदयके उत्तरमें एक बात तो विचारणीय है। सम्पादकने मेरी उस टिप्पणीकी उपादेयताको चुनौती दी है जिसमें मैंने कहा था कि "तर्कोंके आधार पर किये जा रहे विचार-विमर्श में सम्मानित दिवंगत पुरुषोंके वचनोंका हवाला देकर अनुमान निकालना श्रद्धास्पदोंका अपमान माना जाना चाहिए।" 'प्रबुद्ध भारत' स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित संस्थाका मुखपत्र है, इस कारण सम्पादक महोदय इस कथनसे विशेषतया रुष्ट हुए हैं। लेकिन मैं तो अपनी बातको ठीक ही कहूँगा। मेरे विचारसे तर्काश्रित वाद-विवाद में पंथ-विशेषके सदस्यों और उसके मुख-पत्रोंको तो अपने पंथके संस्थापकके वचनोंको घसीटनेसे बचना ही चाहिए; क्योंकि उनपर श्रद्धा न रखनेवाला व्यक्ति कदाचित् उक्त संस्थापककी वाणीको कोई महत्त्व ही न दे। यह ऐसा ही समझिए जैसे श्रीकृष्णके वचनोंका उस व्यक्तिके लिए जो कृष्ण-भक्त नहीं है, कोई महत्त्व नहीं है। यह बात अनुभवसिद्ध है कि उन सभी बातोंमें जहाँ भावनाओंकी

  1. अध्याय ३-२१।