अपेक्षा तर्क ही प्रधान माना जा रहा हो, महापुरुषोंके लेखोंसे--फिर चाहे वे कितने हो महान् क्यों न हों--उदाहरण प्रस्तुत करना अप्रासंगिक होता है तथा ऐसा करनेसे उन बातोंके और अधिक उलझ जानेकी सम्भावनाएँ रहती हैं। मैं सम्पादक महोदय और पाठकोंके सामने यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैंने किसी महापुरुषके किसी कथन-विशेषके उल्लेखकी आलोचना नहीं की है; मैंने यह सुझाव अवश्य दिया है कि उक्त वचनोंका कोई निहितार्थ निकालनेकी अपेक्षा स्वयं पाठकोंको इन बातोंको समझने और अपने निर्णय लेनेकी स्वतन्त्रता दी जानी चाहिए। उदाहरणके लिए, क्या तथाकथित ईसाइयोंन ईसामसीहके सच्चे सन्देशको नहीं तोड़ा मरोड़ा है? क्या सन्देह-वादियोंने ईसामसीह के एक ही तरहके वाक्योंके बिलकुल विरोधी अर्थ नहीं निकाले हैं? इसी प्रकार 'भगवद्गीता' के उन्हीं श्लोकोंके विभिन्न वैष्णव सम्प्रदायोंने क्या अलग-अलग और कभी-कभी तो विरोधी अर्थ तक नहीं निकाले हैं? किसीका वध करनेके लिए भी क्या 'गीता' की गवाही पेश नहीं की जाती? मुझे तो यह बिलकुल स्पष्ट लगता है और तर्ककी भी यह माँग है कि हमें किसी भी महापुरुषके, फिर चाहे जितने बड़े वे हों, वचनोंको प्रमाण-रूप में प्रस्तुत करनेका यत्न नहीं करना चाहिए। आश्चर्यकी बात है कि जिस पत्र लेखकने मुझे 'प्रबुद्ध भारत' की प्रति भेजी थी, उसीने भगिनी निवेदिताकी दो परस्पर-विरोधी उक्तियाँ भी भेजी हैं। उक्तियाँ निम्न हैं:
अन्य लोगों की तरह उन्होंने (विवेकानन्दन) बिना सोचे-समझे यह स्वीकार कर लिया था कि मशीनोंका प्रयोग खेतीके लिए वरदान सिद्ध होगा, परन्तु अब उन्होंने देख लिया है कि अमेरिकाके किसान को अपने कई मील लम्बे चौड़े खेतमें मशीनोंके उपयोगसे भले ही अधिक लाभ हो, किन्तु वही मशीनें भारतमें छोटी-छोटी जोतके मालिक किसानोंका थोड़ा-बहुत हित करनेके बजाय नुकसान ही अधिक करेंगी। दोनों देशोंकी समस्याएँ भिन्न हैं, इसका उन्हें पूरी तरह विश्वास हो गया था। हर मामलेमें, जिसमें उत्पादनके बँटवारेकी समस्या भी शामिल है, वे ऐसे सभी तर्कोंको सशंक होकर सुनते थे जिनमें छोटे-मोटे हितोंकी उपेक्षा की बात कही जाती थी। इस प्रकार वे अनजाने ही अनेक मामलोंकी तरह, इस मामले में भी पुरातन भारतीय सभ्यताकी भावनाओंको बनाये रखनेके पक्षमें दिखाई देते थे। ('मास्टर ऐज आई सॉ हिम,' पृष्ठ २३१)।
उनके (विवेकानन्दके) अमेरिकी शिष्य उनके उस वर्णनसे सुपरिचित हो गये थे जिसमें वे एक पंजाबी महिलाका उल्लेख करते थे जो चरखा कातते हुए उसके स्वरमें 'शिवोऽहम् शिवोऽहम्' की ध्वनि सुनती थी। इसका उल्लेख करते समय उनके मुख पर स्वप्निल सुख झलकने लगता था। (वही, पृष्ठ ९५)
ये अंश स्वामीजी के विचारोंको ठीक-ठीक ढंगसे पेश करते हैं या नहीं, मैं कह नहीं सकता।
- [अंग्रेजीसे]
- यंग इंडिया, २६-९-१९२९