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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५५७

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४२२. पत्र-लेखकसे

'इतिहास के अध्यापक, एक शंकाग्रस्त अनुयायी' को

यद्यपि आपका पत्र थोड़ा महत्त्वपूर्ण है किन्तु मुझे खेद है कि मैं उसपर ध्यान नहीं दे पाऊँगा। मैं ऐसे पत्रलेखकोंको प्रोत्साहित नहीं करता जो प्रकाशन तो प्रकाशन, सम्पादकको आश्वस्त करनेके लिए भी अपना नाम देनेका साहस नहीं रखते। उन्हें सम्पादकों पर इतना विश्वास तो रखना चाहिए कि वे जो कुछ प्रकट नहीं करना चाहते वह प्रकट नहीं किया जायेगा। अगर आप अपनी शंकाओंका उत्तर चाहते हों और इसके लिए अपना नाम बतानेके लिए तैयार हों तो कृपया अपने तर्कोंको पुनः लिख भेजें क्योंकि आपका उक्त पत्र तो फाड़ दिया गया है।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २६-९-१९२९
 

४२३. दो प्रश्न

२६ सितम्बर, १९२९

मैं जब आगरेमें था, एक सज्जनने यह पत्र लिखा था :[]

यदि इन महाशयको मेरे पास आनेसे किसीने रोका हो तो यह दुःख और शर्मकी बात है। हाँ, यह होता तो था कि बेचारे स्वयंसेवक मेरे स्वास्थ्यकी रक्षाकी फिक्र में रहते हुए समयका ख्याल अवश्य रखते थे। उनका प्रेम मुझे उनसे मिलनेवालों से बचाने में खर्च होता था; प्रश्नकार और दर्शनाभिलाषी प्रेमवश समयकी मर्यादाका उल्लंघन करते थे। प्रेमकी दो विरुद्ध दिशाएँ होनेके कारण कुछ खींचतान जरूर होती थी। मिलनेवालोंको कुछ कष्ट भी होता था, परन्तु शामकी प्रार्थनाके समय सब आ सकते थे। किसीको रोकटोक न थी। और प्रार्थना खुले मैदानमें होनेके कारण सब कोई आ जाते थे। हरएकको इतना तो समझ लेना चाहिए कि जब एक से अनेक मिलनेवाले होते हैं तब कुछ-न-कुछ मर्यादा आवश्यक हो जाती है।

अब प्रश्न पर आऊँ:

एक अल्प प्राणी इस पृथ्वी-भरकी जनताके प्रति जितना समभावी हो सकता है, उतना होनेकी मैं कोशिश करता हूँ। इसलिए भारतवर्ष और गुजरात से उतना ही प्रेम करनेकी चेष्टा करता हूँ, जितना पृथ्वीके अन्य प्रदेशों से। लेकिन इस समभावका अर्थ यह नहीं है कि मेरी सेवा सबको एक-सी मिलती है या मिल सकती है। मेरी आत्मा काल, स्थल और प्रसंगके बन्धन से मुक्त होनेके कारण उसका प्रेम तो सबके प्रति समान मात्रामें बँट जाता है। परन्तु चूॅंकि शरीर

  1. यहाँ नहीं दिया जा रहा है।