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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५६१

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४२७. भाषण : बनारसको सार्वजनिक सभामें

२६ सितम्बर, १९२९

सभापतिजी, भाइयो और बहनो,

आप लोग मुझे क्षमा करें कि मेरी आवाज आप सबतक नहीं पहुँच सकती। अब मुझमें १९२० जैसी शक्ति नहीं रह गई है। आपने मानपत्र दिया है, उसके लिए मैं आपका एहसान मानता हूँ। आपने जो पैसे दिये हैं, उसके लिए आपको धन्यवाद है। आप लोग जानते हैं कि जो मनुष्य दरिद्रनारायणका प्रतिनिधि बनकर आपके सामने आया है उसका पेट भर ही नहीं सकता, उसे इतने रुपयोंसे सन्तोष नहीं हो सकता। यह ठीक कहा गया है कि आपके यहाँसे जो रकम मिली है, वह बड़ी रकम नहीं है। श्री मालवीयजी और अन्य सज्जनोंके हस्ताक्षरोंसे पाँच लाख रुपयेकी अपील निकली थी। वह रकम अभी इकट्ठी नहीं हुई है। हम लोगोंके लिए यह शर्मकी बात है। आपसे मुझे अधिक पैसे मिलने चाहिए थे। तो भी आपने अपनी इच्छाके अनुसार जो रकम दी उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ।

मैं आपका बहुत समय नहीं लेना चाहता। अपना बहुत समय दे भी नहीं सकता, फिर मुझे कोई नई बात भी नहीं कहनी है। कांग्रेसने हमें रास्ता बता दिया है। उसने विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करने को कहा है। अगर विदेशी वस्त्रका बहिष्कार काशी में नहीं हो सकता तो फिर वह कहाँ हो सकता है। आप लोग खद्दर पहनें। आप लोगोंने खद्दरके लिए द्रव्य दिया है। यदि आप खद्दर नहीं पहनेंगे तो आपका द्रव्य देना व्यर्थ है।

कांग्रेसने दूसरी बात यह कही है कि हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी अपना-अपना दिल साफ कर लें और आपसमें मेलसे रहें।

बाहर जो-कुछ हो रहा है वह न होने दें।[] उस ओर आप ध्यान न दें। आप लोग सभा में आये हैं इसलिए समाके कामकी ओर ध्यान दें। मैं तो यहाँसे हटनेवाला नहीं हूँ। (हर्ष ध्वनि) हम न हिन्दू राज्य चाहते हैं और न मुस्लिम राज्य। हम जो राज्य चाहते हैं उसमें अमीर, गरीब, किसान, मजदूर, जमींदार सबके अधिकारों और हितोंका ख्याल रखा जायेगा, सबका समान पद होगा। जबतक ऐसा नहीं होता तबतक स्वराज्य नहीं होगा।

तीसरी बात अस्पृश्यता-रूपी कलंक धो डालनेकी है। हिन्दू धर्ममें, जिसमें 'गीता' जैसा ग्रन्थ है और जिसने अद्वैतकी शिक्षा दी है, अस्पृश्यता जैसी कोई बात नहीं है। हिन्दू समाजमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण अवश्य हैं; किन्तु इसके माने यह नहीं हैं कि कोई किसीसे नीचा है। हमें अस्पृश्यता रूपी धब्बा दूर करना चाहिए और अस्पृश्य कहे जानेवाले लोगोंको अपनाना चाहिए। पाठशालाएँ और मन्दिर अस्पृश्योंके लिए खोल दिये जाने चाहिए और कुओंसे अस्पृश्योंको पानी लेने देना चाहिए।

  1. इस अवसर पर सभा के बाहर कुछ शारगुल हुआ था।