है। सट्टेको बन्द करनेके लिए लोकमतको सुशिक्षित और जाग्रत बनाना चाहिए। यह बुराई बहुत पुरानी है, और आज सर्वव्यापक बन गई है। जबतक मनुष्य जाति लोभ का त्याग नहीं करती, तबतक किसी-न-किसी रूपमें सट्टा जीवित ही रहेगा। नवयुवक संसारकी सारी बुराइयों को नहीं रोक सकते। अगर वे स्वयं शुद्ध बन जायें तो बहुत-कुछ हो सकता है।
तीसरा प्रश्न :
क्या विवाह के अवसर पर जातिभोज देना उचित है? बारातमें ३०-३० या ४०-४० आदमियोंका जाना मुनासिब है?
जातिभोज जितना त्याज्य है उतना ही त्याज्य बारातमें जाना है। इनके कारण निरर्थक खर्च बढ़ता है, और धार्मिक विधिकी गम्भीरताको हानि पहुँचती है। जो नवयुवक ब्याहे जायें उन्हें जातिभोज और बारात की प्रथाका दृढ़तापूर्वक विरोध करना चाहिए।
- [गुजरातीसे]
- नवजीवन, २९-९-१९२९
४३७. टिप्पणी
उपवास बनाम सत्य आचार
एक पाठक लिखते हैं:
मनोवृत्ति पर काबू कैसे प्राप्त हो, इस प्रश्नको लेकर हमारे मण्डलमें चर्चा छिड़ी थी। हम सब इस निश्चयपर पहुँचे कि उपवास या सत्य आचरण ही इसके दो मार्ग हैं; किन्तु दोनोंमें सरलतर कौन-सा है, हम इसका निर्णय न कर सके।
मालूम होता है कि इस मण्डलने उपवास और सत्य आचरणके प्रभावका निरीक्षण नहीं किया है। अन्यथा यह प्रश्न खड़ा ही न होता। उपवास में मनोवृत्तिको दबाने की कोई स्वतन्त्र शक्ति नहीं है। अनेक अवसरोंपर उपवास करनेवालेकी मनोवृत्ति मलिन होती देखी गई है। एकादशी वगैराके उपवास करनेवालोंमें से बहुतेरोंका स्वभाव उपवास-कालमें इतना उग्र बन जाता है कि उनके आसपासके लोग उनके नजदीक जाते हुए काँपते हैं। अगर उपवास में मनोवृत्ति पर काबू प्राप्त करनेकी स्वतन्त्र शक्ति होती तो बहुत पहलेसे ही असंख्य भुक्खड़ोंका कल्याण हो गया होता। हाँ, इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिसे मनोवृत्ति पर काबू पानेकी इच्छा है, उसे उपवास यत्किचित् सहायता जरूर करते हैं।
मगर सत्य आचरण मनोवृत्तिको अंकुशमें रखनेका सर्वोपरि साधन है। उसमें मनोवृत्ति पर काबू बनाये रखनेकी अपार और अमोघ शक्ति है। अतएव सत्यके साथ उपवासकी तुलना की ही नहीं जा सकती। जिसमें सत्य नहीं है, वह सचाईके साथ मनोवृत्ति पर काबू पा ही नहीं सकेगा। लेकिन जो सत्यशील है उसके लिए मनोवृत्ति