भाईसे की गई तुम्हारी माँग मुझे तो ठीक लगती है। ऐसे शुद्ध व्यवहारको हम सब समझ नहीं पाते। दिल्लीके श्री आयरलँडकी बात तो मैं तुम्हें बता चुका हूँ न? वे एन्ड्रयूजके परम मित्र हैं। एन्ड्रयूजने उनकी साइकिल इस्तेमाल की, उसके लिए उन्होंने उनसे दो-तीन रुपये ले लिये; क्योंकि वे अपने-आपको साइकिलका ट्रस्टी मानते थे। शिमला जाते समय उन्होंने मुझसे सैकंड क्लासका भाड़ा लेनेसे इनकार कर दिया और इन्टरका ही भाड़ा लिया। ऐसा अति शुद्ध व्यवहार परम मित्रोंके बीच होना ही चाहिए। हरिश्चन्द्र, तारामती और रोहितका उदाहरण तो हमारे पास है ही। तुम निर्भय रहना।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ५४७८) की फोटो-नकलसे।
४५१. हिन्दू पत्नी
नीचे एक भाईके लम्बे पत्रका सारांश[१]दे रहा हूँ, जिसमें उन्होंने अपनी विवाहिता बहनके दुःखोंका वर्णन किया है:
थोड़े समय पहले मेरी बहनका विवाह एक ऐसे व्यक्तिके साथ हो गया, जिसके चरित्रसे हम अनजान थे। यह व्यक्ति बादमें इतना लम्पट और विषयी साबित हुआ...। बहनने उन्हें समझाया, लेकिन वे उसके इस 'औद्धत्य' को सह न सके...। मेरी बहनका हृदय टूक-टूक हो गया है। हम लाचार हैं। कृपा कर कहिए, हम या हमारी बहन क्या करें? हिन्दू धर्मकी शर्मभरी अवस्थाका यह एक चित्र है--उस हिन्दू धर्मकी, जिसमें स्त्रियोंको सर्वथा पुरुषों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसमें स्त्रियोंको न कोई अधिकार प्राप्त हैं और न रियायतें ही। हजारों बहनें इस अन्यायका शिकार बनकर रात-दिन आर्त स्वरसे रोती-कलपती रहती हैं। जबतक हिन्दू धर्मसे ये और ऐसी ही अन्य बुराइयोंका नाश नहीं होता, क्या उन्नतिको आशा की जा सकती है?
पत्र-लेखक एक सुशिक्षित व्यक्ति हैं। उन्होंने अपने पूरे पत्र में अपनी बहनके' दुःखों का रोमांचकारी चित्र खींचा है। इस सारांशमें वे सब बातें नहीं आ सकतीं। पत्र-लेखकने अपना पूरा नाम और पता भी भेजा है। उन्होंने हिन्दू धर्मकी जो निन्दा की है, वह असीम दुःखकी वेदनाका परिणाम होनेसे क्षम्य भले हो, किन्तु उनका यह कथन एक उदाहरणके आधार पर खड़ा किया गया है, अतः अतिव्याप्त और अति- रंजित है। क्योंकि आज भी लाखों हिन्दू ललनाएँ अपनी गृहस्थीकी रानी बनकर पूर्ण सन्तोष और सुखकी जिन्दगी बिताती हैं। वे अपने पतियों पर इतना प्रभुत्व
- ↑ अंशत उद्धृत।