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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५७९

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सहस्रमुखी दानव

स्त्रियाँ एक बार वैवाहिक जीवनका कटु अनुभव पा लेने पर दुबारा विवाह करना ही नहीं चाहतीं। जब किसी समाजका लोकमत इस तरहकी सुविधा प्राप्त करना चाहता है, तो मेरे विचारमें वह मिल भी जाती है। पत्र लेखकके पत्रसे जहाँतक मैं समझ सका हूँ, उनकी यह शिकायत तो कदापि नहीं है कि पत्नी अपनी विषयेच्छा तृप्त नहीं कर पा रही है। उन्हें शिकायत तो पतिके भयंकर और बेलगाम व्यभिचारकी है। जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, मनोवृत्तिको पलट देना ही इसका उपाय है। हमारी और अनेक बुराइयोंके समान ही बेबसीकी भावना भी एक काल्पनिक बुराई है। दूषित कल्पनाके कारण शोक और दुःखका जो साम्राज्य समाजमें फैला हुआ है, वह थोड़ेसे मौलिक विचार और नये दृष्टिकोणके आते ही नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगा। ऐसे मामलोंमें मित्रों और रिश्तेदारोंको चाहिए कि वे अत्याचारके शिकारको शिकारीके पंजेसे छुड़ाकर ही सन्तोष न मान बैठे, बल्कि ऐसी स्त्रीको समझाकर उसे सार्वजनिक सेवाके योग्य बनानेका प्रयत्न करें। इन स्त्रियोंके लिए इस तरहकी शिक्षा पतिके शंकास्पद सहवाससे कहीं अधिक सुखद और लाभप्रद होगी।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, ३-१०-१९२९
 

४५२. सहस्रमुखी दानव

छुआछूत के दानवने अपने सहस्र मुखोंसे विषैले दाँतोंका जितना प्रदर्शन दक्षिणमें किया है, वैसा भयंकर प्रदर्शन अन्यत्र कहीं नहीं किया। इस क्षेत्रका एक पत्र-लेखक इस प्रकार लिखता है:

चूॅंकि कट्टरपंथियोंमें इस बातका भय है कि अस्पृश्यताका प्रचार करनेवाले इस प्रश्नको अनावश्यक रूपसे इतना महत्त्व दे रहे हैं जिससे छुआछूतके मूलभूत प्रश्न और समस्याएँ और अधिक उलझ सकती हैं और अनावश्यक तनाव उत्पन्न हो सकता है; में चाहता हूँ कि आप छुआछूत के कार्यका क्षेत्र और मर्यादा निर्धारित करनेके लिए अपने सुस्पष्ट विचार, प्रश्नोंके रूपमें नीचे लिखी बातोंके आधार पर दें।

यद्यपि मैं नहीं समझता कि 'अस्पृश्यताके प्रचारक' या यों कहें 'अस्पृश्यता-निवारण' के प्रचारकोंने ऐसा कुछ किया है जिससे ऐसा तनाव पैदा हुआ है जो टाला जा सकता था। फिर भी उन प्रश्नों पर विचार करना ज्यादा अच्छा होगा जो उन लोगोंके मनमें भी उठते हैं जिनके इरादे किसी भी प्रकारसे खराब नहीं हैं और जो, यथासम्भव छुआछूत निवारण आन्दोलनको अपना समर्थन दे सकते हैं किन्तु जो अन- जानेमें ही सदियों पुराने पूर्वाग्रहोंसे चिपटे हुए हैं।

पत्र-लेखकका पहला प्रश्न है:

क्या आप यह समझते हैं कि वर्णाश्रम धर्म भारतकी राष्ट्रीयता के निर्माणसे मेल नहीं खाता?