पहली पसन्दगीके प्राप्त मतपत्रोंको इनमें जोड़नेके बादका योग लगानेके बाद परिणाम इस प्रकार रहा :
| श्रीयुत के॰ सन्तानम् | १११[१] |
| डॉ॰ वी॰ सुब्रह्मण्यम् | ८६ |
| श्रीयुत देवशर्मा विद्यालंकार | २२ |
| श्रीयुत एन॰ रामालिंगम् | २ |
| डॉ॰ बी॰ सुब्रह्मण्यम् और श्रीयुत के॰ सन्तानम् चुने गए | |
| कुल मतदाता | ४९० श्रेणी 'क' के |
| ८३ श्रेणी 'ख' के | |
| योग | ५७३ |
| कुल मतदान (वैध) | |
| २१२ श्रेणी 'क | |
| ४७ श्रेणी 'ख | |
| योग | २५९ |
इस प्रकार किसी प्रचार अथवा हंगामा मचाये बिना ४० प्रतिशतसे कुछ अधिक मतदाताओंने चुनाव में भाग लिया। किसी भी प्रकारका अशोभनीय विरोध नहीं हुआ : चुनावके आधारके रूपमें ऐसी कोई आनी बानीकी बात भी सामने नहीं थी। २९० मतपत्रों में से ३१ अवैध पाये गये। निःसन्देह यह बड़ी संख्या है। लेकिन आनुपातिक आधारपर हुए प्रथम चुनावको दृष्टिसे यह संख्या बहुत अधिक नहीं है। हमें आशा रखनी चाहिए कि और अधिक संख्या में स्त्री-पुरुष अखिल भारतीय चर्खा संघके चुनाव में भाग लेंगे क्योंकि यह संस्था भारतमें केवल सुदूर ग्रामोंको चर्खेका सन्देश देनेका कार्य ही नहीं करती बल्कि साथ-साथ उस विशाल प्रजातन्त्र प्रणालीके निर्माण हेतु प्रशिक्षण-स्थलकी तरह काम करती है, जिसमें सेवाभावका ही उच्चतम स्थान है; और योग्यताके आधारपर मिलनेवाले इस पदको पाने की सामर्थ्य हमारे मध्य छोटेसे-छोटे व्यक्तिकी भी हो सकती है। यह उल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय चर्खा संघका मताधिकार संसारकी सभी ज्ञात प्रणालियोंसे अधिक जनतान्त्रिक है। मेरी रायमें आयुको छोड़कर अन्य सभी प्रकारकी योग्यताके बिना दिया गया मताधिकार कोई मताधिकार नहीं है। इससे सच्चे जनतन्त्रकी प्राप्ति हो ही नहीं सकती।
यंग इंडिया, ६-६-१९२९
- ↑ साधन-सूत्र में यह संख्या ७९ है जो सही नहीं लगती।