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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५८६

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४५७. संयुक्त प्रान्तका धर्म

महासभाकी बागडोर इस वर्ष संयुक्त प्रान्तके एक महान् पुरुषके हाथोंमें है और आगामी वर्ष वह उन्हींके नवयुवक सुपुत्रके हाथोंमें रहेगी। इसलिए भारतवर्षके प्रति संयुक्त प्रान्तका कर्त्तव्य बहुत ज्यादा बढ़ गया है। मुझे याद नहीं आता कि कभी किसी प्रान्त के दो नेता, लगातार एकके बाद एक सभापति हुए हों। पिताके बाद पुत्रके गद्दीनशीन होनेका तो यह पहला ही दृष्टान्त है। जिस प्रान्त में पिताके रहते हुए पुत्र इतना योग्य माना जाता हो कि पिताके बाद दूसरे ही वर्षमें वह एक महान् राष्ट्रका नेता बने, उस प्रान्तके लिए अवश्य ही यह गौरवकी बात है।

दूसरे, संयुक्त प्रान्त हिन्दुस्तानके मध्य भागमें बसा हुआ है। संयुक्त प्रान्तमें भारत की स्वतन्त्रताका एक युद्ध हो चुका है। संयुक्त प्रान्त ही पूज्य मालवीयजी का सेवा-क्षेत्र है। संयुक्त प्रान्त ही में हिन्दुओंके सर्वोत्तम तीर्थस्थान हैं और संयुक्त प्रान्तमें मुसलमानी बादशाहत के स्मारक रूप अनेक स्तम्भ, स्मृति-चिह्न भी हैं। इस या ऐसे संयुक्त प्रान्तके लोग अगर जी-तोड़ मेहनत करें, पूरा-पूरा प्रयत्न करें तो अगले साल भारतवर्षकी अभिलाषाके परिपूर्ण होने में कुछ भी कष्ट न हो।

संयुक्त प्रान्त बड़े-बड़े जमींदारों और ताल्लुकेदारोंका केन्द्र है। साथ ही वहाँ निर्धनता भी है। सम्भव है, संयुक्त प्रान्तकी गरीबी उत्कलकी गरीबी से बहुत कम न हो। कई स्थानोंमें तीन-तीन सालसे बराबर अकाल पड़ता चला आ रहा है। लोगोंके पास न काम है, न पैसा है और वे भूखों मरते हैं। जिसमें उन्हें स्थायी काम मिले और वे भूखों मरने से बचें उनके लिए तो वही स्वराज्य हो सकता है। अगर संयुक्त प्रान्तके नौजवान चाहें तो वे गाँवोंमें प्रवेश करके चरखा-प्रचार द्वारा जनताको काम और दाम, दोनों दे सकते हैं। साथ ही विदेशी वस्त्र-बहिष्कार भी सम्पन्न किया जा सकता है। चरखेका जिक्र मैंने एक मिसालके तौर पर किया है। मैं तो यही चाहता हूँ कि किसी-न-किसी तरह हम अपने इन करोड़ों भाई-बहनोंकी बेकारी और उनकी मुखमरी का नाश करें और उनकी सेवामें लग जायें। जबतक हम दूरसे ही उनके बारेमें विचार रखेंगे, परन्तु उनके पास जाकर उनके कष्टोंको जानने और उन्हें मिटानेकी कोशिश नहीं करेंगे, तबतक हमें समझ रखना चाहिए कि हमने कुछ नहीं किया, और उस दशामें स्वराज्य हमारे लिए आकाश कुसुमकी तरह एक काल्पनिक वस्तु- मात्र बना रहेगा।

हिन्दी नवजीवन, ३-१०-१९२९