४५८. पत्र : एम० हिंधेडेको
मुकाम आजमगढ़
३ अक्टूबर, १९२९
आपके पत्र तथा पुस्तिकाओंके[१]लिए मैं धन्यवाद देता हूँ। यह सूचित करते हुए मुझे खेद है कि प्रयोग असफल-से सिद्ध हुए और इसलिए उन्हें फिलहाल छोड़ना पड़ा है। इन्हें मैं किन्हीं अधिक अच्छे मुहूर्त में जब मेरे पास ऐसे प्रयोगोंके लिए समय अधिक होगा, आरम्भ करूँगा। मुझे यह तो मानना ही चाहिए कि दूधके बदले लिया जा सकनेवाला पदार्थ मुझे नहीं मिला है। सोयाबीनसे दूध प्राप्त करनेका सुझाव जरूर आया है; उसे मैं आजमा नहीं सका हूँ। भारत में सोयाबीन आसानीसे नहीं मिलता। मैं इसे पाने की कोशिश कर रहा हूँ। यों दूधके बिना स्वस्थ रहना कठिन नहीं है; लेकिन लम्बी बीमारीके बाद आनेवाली कमजोरी हटाने में दूधका उपयोग न किया जाये तो बड़ा फर्क पड़ता है। मेरे चालीससे भी अधिक साथियोंने बिना राँधा भोजन करनेका प्रयोग किया था किन्तु उनमें से अधिकांशको इसमें सफलता नहीं मिली, इस कारण उन्होंने इसे छोड़ दिया।
हृदयसे आपका,
- श्रीयुत एम० हिधेडे
- अरनेरिंगसुंडरसुगल्सर
- फेड्रिक्सबर्ग एले २८
- कोबिनहाव्न-- ५
अंग्रेजी (एस० एन० १५१९७) की फोटो-नकलसे।
- ↑ एम० हिंडेने भोजन-सम्बन्धी अंग्रेजीकी कुछ पुस्तिकाएँ भेजी थीं। लेखक शाक-सब्जी व फल आदि खानेकी सलाह तो देता था, पर दूध पीनेमें उसका विश्वास नहीं था।