४६०. पत्र : एच० डब्ल्यू ० बी० मोरेनोको
मुकाम आजमगढ़
३ अक्टूबर, १९२९
आपका पत्र मिला। समझ में नहीं आता कि आपको किस प्रकार सान्त्वना दूॅं। आपने मुझे एक रिपोर्ट भेजी थी और यह भी चाहा था कि मैं उसके बारेमें स्पष्ट रूपसे अपने विचार लिखूॅं। किन्तु मैं आपकी इच्छा पूरी नहीं कर सका। 'हाफ बार्न'[१](वर्णसंकर) शब्दको आप अत्यधिक अपमान-सूचक क्यों मानते हैं? इसका एक सुपरिचित अर्थ है और इसका प्रयोग मैंने उन लेखों में भी देखा है जिनका मन्शा आंग्ल-भारतीयोंको अपमानित करनेका नहीं है। शासन करनेवाली जातिके समान ही, किसी औरके द्वारा किये जानेवाले दावेका भी अगर मैं दृढ़तापूर्वक विरोध करूँ तो इसमें गलत क्या है? विरोध तो किया ही जाना चाहिए; शासक-जातिके ऐसे दावोंका प्रतिरोध हो रहा है और क्रान्तिकारी नतीजे सामने आनेवाले हैं। मैं जानता हूँ कि हमारा जन्म हमारे वशकी बात नहीं है; लेकिन जन्मको छिपानेका प्रयत्न किया जा रहा है। वह उसी प्रकार दुःखकी बात है जिस प्रकार ब्रिटिश उपनिवेशों या यूरोप में रहनेवाले भारतीयों द्वारा अपने मूलको छिपानेके निरर्थक प्रयत्न मुझे दुःखद जान पड़ते हैं। शायद मैं ऐसे कितने ही आंग्ल-भारतीयोंको अधिक निकटसे जानता हूँ जिन्हें 'आंग्ल-भारतीय' शब्दका ही पता नहीं है। वे तो केवल इतना जानते हैं कि उनके पिता कोई यूरोपवासी थे और वे उन्हें और उनकी माताको असहाय अवस्थामें छोड़ कर चल दिये हैं। क्या आप निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि नेतागण "अब अपने भाग्यको भारतीयोंके साथ जोड़नेके लिए तैयार हैं?" मैं जानता कि आपकी निजी इच्छा तो यही है। लेकिन नेताओंमें अधिकांशकी यह इच्छा कदापि नहीं हो सकती। अपने पत्रके अन्तिम अनुच्छेदमें आपने लिखा है कि मैं पत्रको 'यंग इंडिया' में प्रकाशित कर दूॅं। अगर आप चाहेंगे तो मैं छाप दूॅंगा किन्तु मैं आपको इस बात पर इस तरह जोर देनेकी सलाह न दूॅंगा। आपका पत्र कटु आलो-चनाका विषय बन जायेगा। आंग्ल-भारतीयोंकी समस्या जितनी आप समझ सके हैं, उससे भी ज्यादा कठिन है और केवल समाचार-पत्रोंमें लिखने-भरसे इसका समाधान नहीं हो सकता। इसे तो ऐसे प्रबुद्ध आंग्ल-भारतीय ही सुलझा सकते हैं जो हालातकी पेचीदगीको समझते हैं और उन लोगोंको उबारनेके लिए नीचे उतरकर आनेके लिए तैयार हैं, जिनकी न तो गोरी चमड़ी है और न ही जिनके पास इतना पैसा है जिससे वे अगुओंकी तरह खतरनाक और बनावटी जीवन जी सकें। मैं यह स्पष्ट कर दूॅं कि मैं इने-गिने सम्पन्न आंग्ल-भारतीयोंके मामलोंमें रुचि नहीं रखता; क्योंकि
- ↑ आंग्ल-भारतीय लोगों के लिए प्रयुक्त शब्द, देखिए "आंग्ल भारतीय" २९-८-१९२९।