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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/५९१

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४६२. पत्र: बसन्तकुमार बिड़लाको

आजमगढ़
३ अक्टूबर, १९२९

चि॰ बसन्तकुमार[],

तुमारा खत और सुत पाकर मुझे बहोत आनन्द हुआ। तुमारे लीये सुत अच्छा माना जाय। अब मेरा संदेश यह है। क्योंकि कातनेका आरंभ कर दीया है उसे यज्ञ समझकर चलाते रहना और नित्य दरिद्रनारायण अर्थात हमारे कंगाल भाई बह्नोंका चितवन करना।

मोहनदासके आशीर्वाद

सी॰ डब्ल्यू॰ ६१७८ से।

सौजन्य: घनश्यामदास बिड़ला

४६३. पत्र: छगनलाल गांधीको

गाजीपुर
३ अक्टूबर, १९२९

चि॰ छगनलाल,

तुम्हारा पत्र मिला है। तुम्हें प्रभुदासकी चिन्ता तो होती होगी। लेकिन इस चिन्ताको मनमें बनाये रखनेके बदले उसे कम करनेका प्रयत्न करना। प्रभुदास लिखता है कि मुझे तुम दोनोंकी जो चिन्ता होती होगी उसे उसका बुखारसे ज्यादा ध्यान है। यह सिद्ध हो जाये कि उसे नीचा प्रदेश अनुकूल नहीं आता तो उसे अल्मोड़ामें ही रहने देना चाहिए। वहाँ भी काम तो है ही और वहाँ भी उसका कुछ लोगोंसे सम्बन्ध बन गया है; इसलिए रहने में भी असुविधा नहीं होगी। शायद यह पत्र मिलनेके समय तक प्रभुदास तुम्हारे पास ही पहुँच जायेगा। मुझे आशा है कि अब उसका बुखार टूट गया होगा।

मैंने रघुनाथको वहाँ पहुँच जानेके लिए लिखा है। उमिया, कुसुम और वसुमती बहनको भी लिखा है। इसलिए पूनियोंकी तकलीफ तो समाप्त हो जायेगी। उसके जानेके बाद तुमने कैसे काम चलाया? मुझे लगता है कि जब वहाँ पूनियाँ न हों

  1. घनश्यामदास बिड़लाका पुत्र।