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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/६०२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

२. आत्मबलको छोड़कर दूसरे सब बल क्षणिक और निरर्थक हैं। अगर ये दोनों बातें सच हों तो प्रत्येक विद्यार्थीको चाहिए कि वह आत्मबलको पहचान ले और उसकी अभिवृद्धि करनेका प्रयत्न करे ।

[ गुजरातीसे ]
नवजीवन, ६-१०-१९२९

४७७. ईश्वरके सम्बन्ध में

एक मित्र यों लिखते हैं : '

यह सवाल कई लोगोंके हृदयमें उठता है, अतः इसपर थोड़ा विचार कर लें । मित्रके कथनानुसार मेरा कथन लचर हो सकता है; किन्तु मुझे उसका ज्ञान नहीं है । मुझे जैसा अनुभव हुआ है, मैंने वैसा लिखा । वह अनुभव अवर्णनीय है । उसकी तो झाँकी-भर दी जा सकती है। उसके वर्णनमें भाषा भी प्राकृत ही हो सकती है । ईश्वरकी दस्तन्दाजीकी तुलना मनुष्यकी दस्तन्दाजीसे कैसे की जा सकती है ? ईश्वर और उसके नियम परस्पर भिन्न नहीं हैं । कर्म किसीको छोड़ता नहीं, न ईश्वर हो किसीको छोड़ता है। दोनों एक ही वस्तु हैं । एक विचार हमें कठोर बनाता है और दूसरा नम्र । संसारमें कोई-न-कोई अपूर्व चेतनमय शक्ति काम कर रही है, उसे आप चाहे, जिस नामसे पुकारें, लेकिन वह हमारे प्रत्येक काममें हस्तक्षेप तो किया ही करती है । हमारा प्रत्येक विचार कर्म है । कर्मका फल होता है । फल ईश्वरी नियमके अधीन है। यानी, हमारे प्रत्येक काममें ईश्वर और उसका नियम हस्तक्षेप किया ही करता है; फिर हम इसे जानते हों, या इससे अनजान हों; इसे स्वीकार करें या अस्वीकार ।

इस संसार में आकस्मिक घटना नामकी कोई चीज नहीं है । जो कुछ होता है नियमानुसार होता है । बात केवल यही है कि हमारी पामरता इतनी अधिक है कि हम उसकी गतिसे अनभिज्ञ रहते हैं । मेरे पाससे होकर साँप चला जाता है, तो भी मुझे नहीं काटता, मैं इसे दैवयोग क्यों मानूं ? ईश्वरी कृपा क्यों नहीं ? या, क्या मैं इसे अपने पुण्यकर्मो का फल मान लूँ ? मगर पुण्यकर्मो के अभिमानका दंश तो सर्पदंशसे भी अधिक जहरीला होता है । ईश्वर-कृपाके सामने अभिमान चूर-चूर हो जाता है ।

श्रद्धाके बारेमें पहले लिख चुका हूँ, अतएव दुबारा नहीं लिखूंगा । अन्धश्रद्धाको मैं नहीं मानता। जहाँ मैं स्पष्ट ऐहिक कारणका अनुभव करूँ, वहाँ तो बुद्धिसे ही

१. यहाँ नहीं दिया जा रहा है। प्रश्नमें आत्मकथा के दूसरे खण्डके अध्याय २१ का फीनिक्स, टॉल्स्टाय और साबरमती आश्रम से प्रारम्भ " वह भ्रम भी संग्रहणीय है' तकके अनुच्छेद देकर अनेक शंकाएँ उठाई गई थीं और अन्तमें पूछा गया या कि श्रद्धा और बुद्धिके क्षेत्र और उनकी मर्यादाएँ क्या है ?

२. देखिए पृष्ठ ४८१-२।