काम लूँगा । लेकिन बुद्धिके थक जानेपर श्रद्धाको आगे बढ़ाऊँगा और संयोग या दैवयोगकी बात नहीं सोचूंगा ।
लेकिन मैं इस तरह बुद्धिवाद द्वारा ईश्वरपर श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर सकता । मैंने थोड़े तर्कका उपयोग किया है; इसका किसीपर प्रभाव पड़े तो ठीक है । मैं अपने लेखों द्वारा दूसरोंमें ईश्वरके प्रति श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर सकता। मैं कबूल करता हूँ कि मेरा अनुभव अकेले मुझे ही मदद कर सकता है । जिन्हें शंका हो वे सत्संगकी खोज करें। खोज करने में पुरुषार्थ तो है ही; उससे पुरुषार्थ करनेका अवसर तो सबको मिल ही सकता है ।
नवजीवन, ६-१०-१९२९
४७८. खादीका अर्थ
एक बारह वर्षके किशोर लिखते हैं:
एक साल तक पहनी हुई फटी धोतीमें से मैंने छः रूमाल बनवाये थे । उनमें से एक प्रदर्शनीमें यह बतानेके लिए भेजा है कि धोतियोंका ठीक-ठीक उपयोग कर चुकनेपर भी वे निरर्थक नहीं जातीं, उलटे उनका सुन्दर उपयोग किया जा सकता है ।
यह कोई आश्चर्यकारक उपयोग नहीं है । अगर कोई चाहे तो मिलकी मोटी धोतीका भी इस तरह उपयोग किया जा सकता है। लेकिन उक्त बातमें मुख्य बात तो यह है कि अधिकतर खादी पहननेके बाद ही ऐसे विचार उठते हैं। खादी हमें गरीबोंका विचार करना सिखाती है, इसी कारण हम उसका सावधानीसे चिन्ता- पूर्वक उपयोग करते हैं । दूसरे, बारह वर्ष के किशोर में इस तरहकी कमखर्चीके विचारों का पैदा होना आश्चर्यजनक है। खादी प्रवृत्तिके कारण अनेक कुटुम्बोंमें ऐसे सुन्दर परिवर्तन होते देखे गये हैं । मैं चाहता हूँ कि दूसरे नौजवान भी इन किशोर भाईका अनुकरण करें। पाठक यह ध्यान में रखें कि आर्थिक दृष्टिसे इन किशोर युवकको इस तरहकी कमखर्चीकी कोई आवश्यकता नहीं थी । लेकिन जहाँ सारा भारत एक कुटुम्ब माना जाता हो, वहाँ तो भारतमाताके एक करोड़पतिके बालकको भी कमखर्चीसे काम लेना चाहिए और बचे हुए द्रव्यको गरीब भाई-बहनोंकी सहायता में खर्च करना चाहिए ।
नवजीवन, ६-१०-१९२९