४८०. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको
गोरखपुर
६ अक्टूबर, १९२९
तुम्हारा पत्र मिला है। माताजी कुछ सेवा तो तुम्हारे पाससे लेती नहीं हैं इसलिए दिल्ली जानेका कोई धर्म है ऐसा तो मुझे प्रतीत नहीं होता है । आश्रम या बीजापुर में रहनेका धर्म मैं महसूस कर सकता हूँ। क्योंकि दोनों में से किसी जगह पर रहते हुए तुम्हें तो भविष्य की तैयारी ही करनी है और शरीरको अच्छा बनाना है । परन्तु [ यह ] मेरे महसूस करनेपर [ अवलम्बित ] न रहना चाहिए। तुम्हारी अन्तरात्मा जो कहे उसीका पालन करो। दिल्ली जानेका मौकूफ रहे तो मेरी सलाह यह है कि बीजापुर जाना । वहाँ शरीर प्रकृति ज्यादा अच्छी रहती है ऐसा तुमको अनुभव हुआ है, इसलिए हाल तो वहीं रहना अच्छा है । धुनकीका काम रघुनाथ, गोविन्दजी इत्यादि तो अच्छी तरह जानते ही हैं। वे कुछ न कुछ तो बतायेंगे ही। अगर कुछ कमी रह जायेगी तो आश्रममें आकर दुरस्त कर लेना । बहुत कुछका तो महावरा [ हो जाने ] से पता चल जायेगा और ज्यों-ज्यों शक्ति आती जायेगी त्यों-त्यों रस मी ज्यादा पैदा होगा । कुछ भी परिवर्तन यहाँसे तो करवानेका साहस मैं नहीं करूँगा ।
बापूके आशीर्वाद
अब तो तुमको काफी अनुभव ज्ञान मिल गया है कि क्या खाना और क्या नहीं खाना।
मेरी शरीर प्रकृति अच्छी है। अभी तो वही खाना चलता है । समयकी संख्या और दूधकी मात्रा कम है । चारके बदले तीन रतल दूध और दही लेता हूँ ।
(जी० एन० २३६६) की फोटो - नकल से ।