४८२. पत्र : आश्रमकी बहनोंको
गोरखपुर
[७ अक्टूबर, १९२९]
समय-समयपर तुम लोगोंकी याद आती रहती है। सफरमें जैसे-जैसे बहनोंको देखता हूँ, वैसे-वैसे तुम्हारे सामने पड़े हुए कामका विचार आया करता है और वैसे-वैसे समझता हूँ कि उत्तम तालीमका सम्बन्ध तो हृदयसे है । अगर उसमें शुद्ध प्रेम प्रकट हो, तो बाकी सब कुछ अपने-आप आ जाता है । सेवाका क्षेत्र अमर्यादित है । सेवाकी शक्ति भी अमर्यादित बनाई जा सकती है, क्योंकि आत्माकी शक्तिकी कोई मर्यादा है ही नहीं। जिसके हृदयके कपाट खुल गये हैं, उसके हृदयमें तो सब कुछ समा सकता है। ऐसे आदमीका किया हुआ जरा-सा काम भी खिल उठता है । जिसके हृदय बन्द हैं, उसका ज्यादा काम भी नहीं के बराबर होगा । विदुरकी भाजी और दुर्योधनके मेवेमें यही अर्थ छिपा हुआ है ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ३७०४ ) की फोटो - नकलसे ।
४८३. पत्र : छगनलाल जोशीको
गोरखपुर
मौनवार, ७ अक्टूबर, १९२९
तुम्हारा पत्र मिल गया है। इसके साथ छगनलाल गांधीका पत्र भेज रहा हूँ । माणसासे कोई [ धुनाई ] सीखनेके लिए आये तो उसे रखनेका सुझाव मुझे ठीक लगता है ।
तुम्हारे भेजे हुए तार तो वापस भेज रहा हूँ । सीधे यहाँ आये हुए तारोंके ढेरको तो मैंने कूड़ेकी टोकरीमें डाल दिया है।
टिड्डियोंने यहाँ भी काफी नुकसान किया है । वहाँ क्या हुआ यह अब मालूम होगा ।
आज मेरा समय समाप्त हो गया है; इसलिए ज्यादा नहीं लिखता ।
बापूके आशीर्वाद
१. बापुना पत्रो : आश्रमनी बहेनोनेसे ।