अशोभनीय पतलूनको अपनाकर तथा टोपको अपनाने की तरफ कुल मिलाकर हिच-कते रहकर, गलती की है। मैं मानता हूँ कि किसी भी राष्ट्रकी रुचि अरुचिका तर्क-सम्मत होना जरूरी नहीं। स्काटलैंडका निवासी शत्रु द्वारा आसानीसे पहिचाने जाने और उसका शिकार होनेके भयको भी नजर अन्दाज करके अपने बेडौल 'किल्ट'[१] को नहीं त्यागता। मैं नहीं मानता कि भारत टोपके प्रति उदार हो सकेगा; फिर भी दुर्गाशंकरजीकी कोटिके कार्यकर्त्ताओंको आलोचनासे परेशान नहीं होना चाहिए और खादीसे तैयार टोपकी तर्जपर बनी चीजका उपयोग कर लेना चाहिए। सच पूछा जाये तो यह सहज संवहनीय छतरी है, जो अपना एक हाथ उलझाए बिना ही सिर ढँकनेके काम में लाई जा सकती है। कलकत्तेके पुलिसमैनको अपने कमरपटमें छाता रोपकर धूपसे अपना सिर बचाना पड़ता है; इस तरह उसे किसी अंग्रेज पुलिसमैनकी तुलना में दुहरी असुविधा होती है। टोपके बारेमें, जिनका घोर दुराग्रह है, वे मेरे द्वारा इंगित इन दो उदाहरणोंपर ध्यान दें। यहींपर मैं पाठकोंका ध्यान इस प्रकारके देशी और कारगर टोपकी ओर भी दिला दूँ; जिसे मलाबारके गरीब किसान पहनते हैं। यह भी पत्तोंकी बनी बिना डंडीकी एक छतरी-सी होती है जिसे सिरमें फँसा रखनेके लिए छालके गोल घेरेसे काम लिया जाता है। यह सस्ता है और पूरी तरह कारगर भी है। टोपसे इसका कोई साम्य नहीं है; फिर भी यह उतना ही उपयोगी है।
यंग इंडिया, ६-६-१९२९
२१. क्षमा प्रार्थना
मुझे हमेशा दुःख रहा है कि हिन्दी नवजीवनका सम्पादक होते हुए भी मैंने इसके लिए कुछ लिखा ही नहीं है। लिखने की इच्छा तो प्रबल रही है; परन्तु इससे पहले उसे सफल न कर सका। अबसे इरादा है कि हर सप्ताह कुछ-न-कुछ लिखता रहूँगा।
२२. कताई बनाम बुनाई
खादी आश्रम रींगससे मूलचन्दजी लिखते हैं :[२]
मैं ऐसा मानता हूँ कि जो कृषक बुनना सीखना चाहते हैं उनको बुनना सिखाना खादी-सेवकका धर्म है। परन्तु जैसे धुनाईका सफलतापूर्वक प्रचार किया जा सकता है, और वह आवश्यक है, वैसा बुनाईके बारेमें नहीं कहा जा सकता। बुनाई कताई-का अविभाज्य अंग है; जैसे, रोटी पकानेके लिए आटा गूंधना। जो आटा नहीं गूंध