४९१. पत्र : गिरिराजको
मुकाम बस्ती
८ अक्टूबर, १९२९
तुम्हारा पत्र मिला। अगर तुम चाहो और प्रो० छाया तुम्हें निजी तौरपर पढ़ाना स्वीकार कर लें तो मेरा विचार है कि वी० जी० इन्स्टीट्यूट जानेकी जरूरत नहीं रहेगी। दरअसल यह सब तो तुम स्वाध्याय द्वारा ही प्राप्त कर सकते हो । निरीहताकी इस परिस्थितिपर, जो हम अपने चारों तरफ देखते हैं, हमें काबू पाना ही है । तुम्हारा प्रशिक्षण इतना हो चुका है कि तुम प्रशिक्षककी सहायताके बिना किसी भी विषयकी उच्च शिक्षा स्वाध्याय द्वारा प्राप्त कर सकते हो। प्रयोगशालाकी जरूरत पड़ सकती है। इसका प्रबन्ध आसानीसे किया जा सकता है । लेकिन मैं चाहूँगा कि इस बारे में जल्दी न की जाये। पहली चीज तो चमड़ा कमानेका व्याव- हारिक अनुभव पा लेना है । जब तुम इस कार्य में प्रशिक्षित हो जाओगे तब तुम्हारे लिए सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त करना आसान हो जायेगा और तुम्हारा क्रियात्मक अनुभव तुम्हें सिद्धान्तकी असंगतियोंको जाँचने में सहायक होगा। मैं ऐसे कई लोगोंको जानता हूँ जो चमड़ा कमानेका किताबी ज्ञान तो रखते हैं परन्तु खालका एक टुकड़ा भी नहीं कमा सकते । इसलिए मैं चाहूँगा कि अभी तो तुम अच्छी तरह अपने-आप चमड़ा कमानेकी योग्यता प्राप्त करो; इतनी अच्छी कि गाँवके चमड़ा कमाने वालोंके मुकाबिलेमें तो आ ही जाओ। यह काम भी आसान नहीं लगेगा । तुम जानते हो कि गाँवमें चमड़ा कमानेवाले लोगोंको रसायनशास्त्रका ज्ञान नहीं होता । मौजूदा शिक्षा-प्राणालीने हर बात कठिन बना दी है; और इसीलिए वह अधिकांश लोगोंकी पहुँचके बाहर भी है । हमें इस प्रणालीको उलट देना होगा ।
अंग्रेजी (एस० एन० १५६१५) की माइक्रोफिल्म से ।