सकता है। शायद इन लोगोंको परम्परावादी हिन्दू नहीं माना जाता लेकिन पण्डित मदनमोहन मालवीयने भी, जिन्हें समस्त हिन्दू परम्परापरायण मानते हैं, इस दिशामें चलनेवाले सुधारोंमें अपनी पूरी-पूरी सहमति और शक्तिका उपयोग आरम्भ कर दिया है। कोई भी यह देख सकता है कि अब उद्धारके लिए शान्तिसे, किन्तु दृढ़तापूर्वक, कार्य हो रहा है। अछूतोंके लिए तथाकथित उच्च वर्णवाले हिन्दू स्कूल और छात्रावास तैयार करा रहे हैं। अछूतोंके इलाजकी व्यवस्था हो रही है। दूसरे ढंगसे भी उन्हें मदद दी जा रही है। इन प्रयत्नोंका सरकारसे कोई सम्बन्ध नहीं है। लगता है कि ये सब हिन्दुओं द्वारा की जा रही आत्मशुद्धिके लक्षण हैं। अन्तमें यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसने सन् १९२० में ही अपने रचनात्मक कार्यक्रममें छुआछूत-निवारणके कामको महत्त्वपूर्ण स्थान दिया था। यहाँ यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि छुआछूत एक भयंकर सामाजिक बुराई तो है, परन्तु उसके पीछे कोई कानूनी शक्ति नहीं है। जहाँतक मुझे मालूम है, अछूतोंको कानूनकी दृष्टिसे किसी प्रकारकी निर्योग्यताका सामना नहीं करना पड़ता।
फिर भी सुधारकोंके लिए यह कार्य कठिन है। उन्हें जन-साधारणको अपने विचारोंके अनुकूल ढालना पड़ता है। सामान्य लोग सुधारककी दलीलोंको बुद्धिसम्मत तो मानते हैं किन्तु समाज-बहिष्कृत अपने भाइयोंको मिलानेकी दिशामें कोई कदम उठाते हुए हिचकिचाते हैं। बहरहाल छुआछूतका अन्त निकट ही है और हिन्दू धर्मको बच गया ही समझिए। जैसा मैंने ऊपर कहा है, हमारी नगरपालिकाएँ इस समस्याको हल करनेमें बहुत ज्यादा योग दे सकती हैं।
मो॰ क॰ गांधी
कलकत्ता नगरपालिका गजट, पाँचवाँ वार्षिक अंक, शनिवार, २३-११-१९२९; तथा एस॰ एन॰ १९८५४से भी।