५२३. पत्र: छगनलाल जोशीको
हरदोई
१२ अक्टूबर, १९२९
तुम्हारा पत्र मिला। तुम जब काममें लगे हुए हो और मुझे खास लिखनेको कुछ न हो तो सिर्फ लिखनेकी खातिर लिखनेका लोभ न करना। आश्रमसे डाक तो आती ही है; उससे मैं जान लेता हूँ कि सब कुशल है।
यदि द्वारकानाथको रहने दो या रखो तो उसे ६० रु० देने चाहिए। दिनकररायको अभी १५० रु० नहीं चाहिए, ऐसा मुझे लगता ऐसा मुझे लगता है। जबतक पति-पत्नी दोनों आश्रममें रहें तबतक उनका काफी खर्च बचेगा। घरका किराया तो देना नहीं होगा। फिर रहन-सहन भी कुछ बदलेगा ही; इसलिए यदि वे चाहें तो अपनी भावी आवश्यकताएँ भी आसानीसे कम कर सकते हैं। इसलिए उसकी बाहरकी कोई खास जरूरत न हो तो मैं उसे ७५ रु॰ देना पसन्द करूँगा और जब हमें उसका अनुभव हो जाये और उसे जहाँ चाहे वहाँ निर्भयतापूर्वक भेज सकें और उस वक्त वह अधिक चाहे तो १५० रु॰ भी दिये जा सकते हैं। इस समय तो दिनकरराय आदर्श गोसेवक बनेगा, इस आशासे उसे अपने पास रखें। इसलिए हमारा उसे अपने नियमके अनुसार ही पैसा देना ठीक होगा। यह सब समझकर कार्यवाहक मण्डलको जैसा ठीक लगे वैसा करे।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४५६) की फोटो-नकलसे।
५२४. गुजरातियोंका प्रेम
जब कि मैं जगह-जगह प्रेम-रूपी जलमें स्नान कर रहा हूँ, प्रान्त -प्रान्तके प्रेममें भेद करना अथवा उसकी कीमत आँकना निरर्थक है, अनुचित भी हो सकता है। मूक बनकर इस प्रेमका पान करनेमें अथवा यों कहिये कि इसे सह लेनेमें ही उपकारका सर्वोत्तम प्रतिदान है। मैं यह जानता हूँ तो भी हमेशा इस नियमका पालन नहीं हो पाता। गुजराती भाई जहाँ होते हैं, वहाँ वे मुझे ढूँढ़ निकालते हैं, मेरे लिए कुछ विशेष काम करनेकी जी-तोड़ मेहनत करते हैं; और उपकारका यत्किंचित् बदला नहीं चाहते। ऐसी एक ताजी घटना कानपुरमें हुई, जिसे मैं भूल नहीं सकता। वहाँ गुजरातियोंने मुझे अलग सभामें आनेका न्यौता दिया और अपनी संख्या और अपने धन्धेके लिहाजसे, और जिस तरह कानपुरमें चन्दा इकट्ठा किया गया था उसे देखते हुए, उन्होंने एक ठीक-सी रकम दी। रकम १,१५२ ) की थी। लेकिन मैं ठहरा लालची।