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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/६४८

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५२९. पत्र: आश्रमकी बहनोंको

हरद्वार
मौनवार [१४ अक्टूबर, १९२९][]

बहनो,

आज हम गंगाके उद्गमके नजदीक पहुँच गये हैं। यहाँसे बिलकुल नजदीक ही गंगाका सपाट भूमिपर बहना प्रारम्भ होता है। अब आगे बढ़नेपर धीरे-धीरे पहाड़ आयेगा।

आज मौनवार होनेके कारण कुसुम, प्रभावती और कान्ति देवदासके साथ प्रसिद्ध स्थान देखने निकले हैं। यहाँ कुदरतकी तो कृपा है, मगर इन्सानने सारी जगह बिगाड़ रखी है।

आज बस इतना ही।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (जी॰ एन॰ ३७०५) की फोटो-नकलसे।

५३०. पत्र: छगनलाल जोशीको

हरद्वार
मौनवार, १४ अक्टूबर, १९२९

चि॰ छगनलाल,

दो दिनकी डाक आज यहाँ एक साथ मिल गई है।

पृथुराजका पत्र साथ भेजने की बात लिखी है; किन्तु वह रह गया; वह तुम्हारे पत्रके साथ नहीं है।

अपने स्वास्थ्यके बारेमें तुम्हें लापरवाही नहीं करनी चाहिए। जब बहुत दिनोंसे ज्वर आ रहा है, तो थकान तो होनी ही चाहिए। इच्छा तो तुम्हें मसूरी बुला लेनेकी होती है; किन्तु फिर भी तुम्हें मसूरीमें ज्यादा नहीं रखा जा सकेगा; और तब कुछ फायदा नहीं होगा। मैं तो चाहता हूँ कि तुम वर्धा या पुडुपालैयम जाओ। ठंडी जलवायुमें जाना हो तो अल्मोड़ा जाओ। मुझे तो लगता है कि तुम्हारा बाहर जाना ही काफी होगा। रमणीकलाल वहाँ आ सके तभी निकल सकते हो, यह भी जरूरी नहीं होना चाहिए। नारणदास सँभाले तो उसे सौंप सकते हो, यदि चाहो तो उसे समझाऊँ। चाहे जैसे भी हो तुम्हें बाहर निकलना चाहिए। स्वास्थ्यको हृदय से ज्यादा बिगड़ने मत दो।

  1. हरद्वार पहुँचनेके उल्लेखसे।