२७. नगरपालिकाएँ क्या करें?
यह जानने योग्य है कि विविध बहिष्कारोंके सिलसिले में गुजरातकी नगरपालिकाएँ और स्थानिक संस्थाएँ क्या करती हैं। मुझे पता नहीं कि गुजरातकी नगरपालिकाओं और स्थानीय निकायोंमें से कितनोंपर कांग्रेसका प्रभाव है। विदेशी वस्त्र-बहिष्कार समितिके सामयिक प्रकाशनोंसे इस बातका पता चलता रहता है कि जिनमें कांग्रेसके सदस्य चुने गये हैं उनमें बहिष्कारके सम्बन्धमें कितना काम हो सकता है। यह समिति काम करनेवाली नगरपालिकाओंके नाम प्रकाशित करती रहती है। इन सूचियों में गुजरातकी संस्थाओंके इने-गिने नाम ही रहते हैं। होना तो यह चाहिए कि इस काम में भी गुजरातका बड़ा हिस्सा हो। गुजरात में या भारतमें ऐसी नगर पालिकाएँ या स्थानीय निकाय बहुत थोड़े होंगे, जो बहिष्कारको न मानते हों।
ये संस्थाएँ एक काम बड़े पैमानेपर कर सकती हैं। यह तो निश्चित है कि जब बहिष्कार आन्दोलन जोरपर होगा तब खादीकी माँग खूब बढ़ेगी। इस माँगको पूरी करनेमें नगरपालिका भली-भाँति हाथ बँटा सकती है। ये सभी संस्थाएँ अपनी पाठशालाओं में सूत कतवायें और अपने नगरोंमें ही उसे बनवा लें। यह काम बड़ी आसानी और कम खर्चे में ही हो सकता है। अगर इस तरह तैयार खादी सम्बन्धित गाँवों या शहरोंमें न खप सके तो दूसरे स्थानोंमें तो आज वह सहज ही बेची जा सकती है। अगर यह काम सार्वत्रिक रूप धारण कर ले तो कपड़ेकी कमी कभी पड़े ही नहीं। जैसे, गेहूँ मिलते हैं, तबतक हम रोटोकी कमीकी कल्पना तक भी नहीं कर सकते, वैसे ही जबतक देशमें रुई मिलती है, तब तक लोगोंको कपड़े की कमीका अनुभव ही न होना चाहिए।
ऐसे संगठित कामके लिए खादीमय वातावरणकी जरूरत है। अगर ऐसा वातावरण हो तो घर-घर याज्ञिक पाये जायें और घर-घर सूत कते। इस तरहके वातावरणके निर्माणका आरम्भ नगरपालिकाको शालाओं द्वारा शीघ्र ही किया जा सकता है।
जो बात नगरपालिकाओंके लिए ठीक है, वही राष्ट्रीय शालाओंपर लागू होती है।विद्यार्थियोंका खादी-फेरीके लिए बाहर जाना तो अच्छा है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरत तो खादीके उत्पादनकी है। उत्पादनके लिए अधिक परिश्रम, कला और धीरजकी अपेक्षा रहती है। अतएव जो लोग खादी और बहिष्कारके तत्वको समझते हैं उन्हें इस समय उत्पादनपर अधिक जोर देना चाहिए। गुजरात, गरीब बह्नों द्वारा कता सूत भले ही कम पैदा करे, मगर उसमें यज्ञार्थं सूत कातनेकी तो अटूट शक्ति होनी चाहिए। आजकल काठियावाड़में भाई फूलचन्दकी मण्डली खादी-फेरी करती रहती है। यह स्तुत्य कार्य है। उन्हें सफलता भी मिलती है। मगर यही मण्डली सूत पैदा क्यों न करे, और क्यों न दूसरोंको सूत कातना सिखाये?
नवजीवन, ९-६-१९२९