फिर अधिक चर्चा आदि न करें; और इसीमें बहुत दिन न निकाल दें। निर्णय लेनेमें भी ज्यादा समय नहीं लगाना चाहिए। दीवाली आनेपर फिर विचार करनेकी गुंजाइश तो रखी ही है। इसलिए मैंने सोच लिया है। फिर भी इस छूटका तुम सब निःसंकोच उपयोग कर सको, मैंने इसीलिए यह बात छेड़ी है। किन्तु हमें उसे रोज चर्चा करनेका विषय तो नहीं बनाना है।
देवदासको जामियामें एक मददगारकी जरूरत है। उसे मालूम हुआ है कि ईश्वरलाल अंग्रेजीके लिए बाहर जाना चाहता है। इसलिए उसने आज सुझाव दिया है कि ईश्वरलाल जामियामें जाये तो उसे भी मदद मिलेगी और वह ईश्वरलालको स्वयं अंग्रेजी सिखा देगा। जामियामें ईश्वरलालको वैसा अंग्रेजी वातावरण नहीं मिलेगा जैसा राजाजीके आश्रममें मिल सकता है। किन्तु जितना अवकाश वहाँ नहीं मिल सकता, उतना अवकाश अवश्य मिलेगा। ईश्वरलालसे पूछना, यदि उसकी इच्छा हो तो फौरन दिल्ली चला जाये। देवदास अभी वहाँ फौरन नहीं जा सकेगा इसलिए फिलहाल वह देवदासके बदले बालकोंको कातना सिखाये। और बादमें देवदास वहाँ पहुँच जायेगा। मैं ईश्वरलालको जबरदस्ती नहीं भेजना चाहता। उसकी इच्छा हो, तभी जाये। देवदास तो कान्तिको बुलाना चाहता था किन्तु मैंने सोचा कि तुम कान्तिको वहाँसे नहीं भेज सकोगे। और मुझे यह भी लगता है कि यदि कान्ति काफी अरसेके लिए दुग्धालयसे जाता है तो उसमें उसकी रुचि कम हो जायगी और मिला हुआ ज्ञान भी जाता रहेगा। और अन्तमें दोनोंसे हाथ धोना पड़ेगा। ईश्वरलाल जानेको तैयार न हो और कोई दूसरा जाना चाहे, तो उसका नाम मुझे बताना।
बापूके आशीर्वाद
दुबारा नहीं देखा।
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४५९) की फोटो-नकलसे।
५३३. पत्र: गंगादेवी सनाढ्यको
हरद्वार
१५ अक्टूबर, १९२९
तुमारा शरीर अब कैसा है? इस बातका ख्याल तो हमेशा आता है। दाक्तरने ओपरेशनका तो मौकुफ ही किया है क्या? अगर ओपरेशन करना चाहे तो करवा लेना। बीलकुल डरना नहीं। आजकल कितना सोती है? तोतारामजीकी आंख कैसी है?
बापुके आशीर्वाद
जी॰ एन॰ २५४१ की फोटो-नकलसे।