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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/६५८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

कारण ही, उसने चाहा था कि आप सोदपुरको अपना स्थान बना लें और यहाँके सभी आश्रमवासियोंके आध्यात्मिक उत्थानको आपकी उपस्थितिसे प्रेरणा मिले।

लेकिन बात केवल पत्रके विषयतक नहीं है। कृष्टोदासने और भी जो कहा, उसे मैं हँसीमें नहीं टाल सका। उन्होंने अल्मोड़ामें आपके साथ हुई उस बातचीतका विवरण दिया जिसमें मेरा और प्रतिष्ठानका जिक्र हुआ था।

निरंजन बाबू साबरमतीसे लौटते हुए मुझसे मिले थे। मेरी उत्कलकी रिपोर्टपर आपकी फबतोके बारेमें उन्होंने भी मुझसे कहा था, जिसे मैं तब बिलकुल नहीं समझ सका था, यद्यपि जो-कुछ उन्होंने कहा उससे मुझे क्लेश हुआ था। अब कृष्टोदासजीसे मिलनेके बाद निरंजन बाबूके कथनका अर्थ खुल गया। इन सभी बातोंमें आपने अपने साथ भारी अन्याय किया है। देखिए, कुछ समय बीतने दीजिए।

आज सुबह जागने पर मैं जब प्रार्थना-स्थलकी ओर जा रहा था, मनमें मार्क्सऑलियस का एक विचार बरबस कौंध गया और भीतर अन्तःकरणसे एक स्वर उठने लगा: "आज मुझे प्रहारों का सामना करना पड़ेगा...पर मुझे कोई भी आहत नहीं कर सकेगा।" दोपहरको दो बजे कृष्टोदासजी आये और निस्सन्देह प्रहार ही मिले।

प्रणाम सहित,

सतीश

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५१९४) की माइक्रोफिल्मसे।

परिशिष्ट ३

मु॰ रा॰ जयकरका पत्र

३९१, ठाकुरद्वार
बम्बई
२३ अगस्त, १९२९

निजी
प्रिय महात्माजी,

मैं आपको यह लिख रहा हूँ; मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इसका कोई गलत अर्थ नहीं लगायेंगे। बम्बईमें आजकल ऐसा कुछ फैशन चल पड़ा है कि अपने समाजके पक्षमें बोलनेवाले किसी भी हिन्दूको साम्प्रदायिक कहकर उसकी निन्दा की जाती है; और मुसलमान नेताओंपर ऐसे आरोप नहीं लगाये जाते। मुझे विश्वास है कि आप ऐसी किसी एकांगी कसौटीपर मेरे विचारोंको कसकर उनके बारेमें अपनी राय नहीं बनायेंगे।

आपको यह पत्र लिखनेका मेरा प्रयोजन यही है कि मैं (हिन्दू महासभासे बाहर के) हिन्दुओंके विशाल समुदायकी इस आशंकासे आपको अवगत करा दूँ कि हिन्दू- मुस्लिम समस्याके बारेमें नेहरू समितिके प्रतिवेदनमें सुझाये गये हलमें इस वक्त कोई थोड़ा-बहुत बदलाव करनेकी कोशिशके परिणाम काफी दूरतक जा सकते हैं। मेरा