बलसाड़के विभीषण,[१] क्या करेंगे, यह देखना बाकी है। नगरपालिका चाहे तो एक दिनमें ही इस अमानुषिक स्थितिका हल निकाल सकती है। मुख्य अधिकारी, इन मंगियों पर कितना कर्ज है यह मालूम करके पठानोंसे मिलकर पैसे चुकानेका फैसला कर सकता है; और बड़ी आसानीसे सहकारी मण्डल बना सकता है। उन्हें क्यों कर्ज लेना पड़ता है, यह मालूम किया जा सकता है; और फिर जो गलत तरीकेका कर्ज लेता है, उसे ऐसा न करनेके लिए समझा सकता है। ऐसे काम में अधिकारीको बहुत कम समय लगेगा और काम भी फौरन ठीक ढंगसे निबट जायेगा।
२. यही अधिकारी उनके खर्चकी जाँच करके वेतन कम ज्यादा करनेका विचार भी कर सकता है।
३. यदि कोई अपने कुएँ में से उन्हें पानी भरने देनेके लिए तैयार न हो तो नगरपालिका उन्हें कुआँ बनवा दे।विभीषणधर्मी हिन्दुओंको चाहिए कि वे दूसरोंके सन्मुख उदाहरण पेश करनेके लिए समय-समयपर उसमें से अपने लिए पानी भरें और इसी निमित्त कुएँको साफ भी रखें।
४. ४२ नौकरोंके रहनेके लिए मनुष्योंके योग्य जितनी जगह जरूरी हो उतनी जगह बिना विलम्बके बनवा दी जाये और उनके रहनेके स्थानके पास जो पाखाने बनाये जायें उनको इस्तेमाल करनेकी छूट भंगी स्त्रियोंको भी है, यह बात भंगी स्त्रियों और दूसरी स्त्रियोंको भी समझा दी जाये।
५. यदि चालू शाला में भंगी लड़कोंको लानेसे बलसाड़के लोग क्रुद्ध हों तो नगरपालिका भंगियोंके लिए एक अच्छी शाला भी बनवाये और सवर्ण विभीषण उसमें अपने बच्चोंको भेजें। ये सभी काम ऐसे हैं जिन्हें नगरपालिका तुरन्त कर सकती है। किन्तु यदि नगरपालिका अपने कर्त्तव्यका पालन न करे तो बलसाड़के कांग्रेसी उसे करें; उसका युवक संघ उसे करे। ४२ व्यक्तियोंकी दुरवस्था सुधारनेमें न कोई बड़ा आर्थिक प्रश्न उठता है न बहुतसे कार्यकर्त्ताओंके होने न होनेका प्रश्न उठता है। प्रश्न तो मात्र दया भावना का ही है। यदि बलसाड़में कहीं दया देवीका वास न हो तो ऐसी निर्दयताकी कहानी 'नवजीवन' की फाइलमें ठक्करबापाके दुखकी निशानीके रूपमें बनी रहेगी। बलसाड़में कोई सतर्क व्यक्ति हो तो इस सम्बन्धमें कुछ किया गया है या नहीं यह 'नवजीवन' को लिखकर बता सकता है।
नवजीवन, ९-६-१९२९
- ↑ आशय उन सवर्ण हिन्दुओंसे है जो अन्य सवर्ण भाइयोंके इस अत्याचारका उसी प्रकार बुरा मानते हैं जिस प्रकार विभीषण अपने भाई रावणके कर्मोंको बुरा मानते थे।