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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/८३

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पत्र : छगनलाल जोशीको


अतिथिगृहको 'नन्दिनी' कहनेका कोई कारण नहीं दिखाई देता। महादेवके घरके साथ भणसालीका नाम जोड़ना मुझे तो अच्छा लगेगा। उसे 'जय भवन' क्यों न कहें? रसोईका नाम 'शारदा मन्दिर' किसलिए? 'भोजनशाला' क्यों नहीं? वहाँ दोनों चीजें हैं। इसलिए दोनों नाम होने चाहिए। 'बुनकर निवास 'के लिए 'कैलाश' नाम आडम्बरपूर्ण लगता है। 'रुस्तम ब्लाक' से कुछ सूचित हो सकना चाहिए। ब्लाकके लिए गुजराती शब्द ढूँढ़ना होगा। गोशाला सूचक शब्द है; उसे बदलकर गोकुल जैसा परम पवित्र नाम रखने का हमें कोई अधिकार नहीं है। उत्तर प्रान्तर् और दक्षिण प्रान्तर् मुझे तो ठीक नहीं लगते। राजमार्ग-नामको तो छोड़ ही देना चाहिए। वीथोको रहने दूं कि नहीं इस विषय में कुछ शंका है। तीर्थको भी छोड़ ही देना चाहिए।

मेरी इन आपत्तियों के मूलमें क्या कारण है, वह अब सहज ही समझमें आ सकेगा। प्रार्थनाके समय नामोंके बारेमें कहने को कहा गया था; इसलिए उसके उत्तर में यह कहा गया है, ऐसा मानना। इसपर अमल होना ही चाहिए, ऐसा बिलकुल नहीं समझना। दूसरी बातोंके साथ इसपर भी विचार कर लें, इतना ही काफी है। इसके बारेमें काका ज्यादा अच्छी तरह विचार कर सकेंगे।

साथ भेजे जा रहे नोटिस[] को सँभालकर रखना। छगनलाल जब जाये तब प्रबन्धकसे जरूर मिले। यदि कोई काम शुरू किया होगा, तब तो कोई समस्या ही न रहेगी।

बहियल में खादीके उत्पादनके बारेमें भाई छोटालालने दुबारा जो योजना बनाई है, उसे मैंने देख लिया है। उसे इसके साथ भेज रहा हूँ। कताई सम्बन्धी अंश उसका सबसे कमजोर हिस्सा है। नये वर्ग में से जो लोग निकले हैं, उन्हीं में से यदि कोई पिजाई करे, तभी वह सफल हो सकती है।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (एस° एन° १५८०२) की फोटो नकलसे; बापुना पत्रो–७ :

श्री छगनलाल जोशीने पृष्ठ ११४–६, से भी

 
  1. छगनलाल गांधी बीजापुर खादी-आश्रमके व्यवस्थापक व न्यासी थे। उल्लिखित नोटिस उन्हें गायकवाड़ सरकारने भेजा था।