४३. पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको
बरेली
१३ जून, १९२९
इधर-उधर यात्रामें रहनेपर तुम्हें नहीं लिख पाता। इरादा बहुत रहता है किन्तु साप्ताहिक डाकका समय आ जाता है और पत्र रह जाता है। इस समय भी मुसाफिरोपर हूँ। पहाड़को मुसाफिरी है। आज तो हम एक पहाड़की तलहटी, बरेली में हैं। खूब गर्मी है। इस बार अच्छा खासा साथ है। बा है, पुरुषोत्तम है, पृथुराज है, प्यारेलाल है। देवदास अलमोड़ा में मिल जायेगा। मुसाफिरीका प्रबन्ध प्रभुदासने किया है। बह्नों में से जमनाबहन, खुर्शीदबहन, मीराबहन और कुसुमबहन साथ हैं। महादेवको वल्लभभाईने रोक लिया है। तुम दोनों न आ सको और सुशीला आ जाये तो भी ठीक है। किन्तु उसका स्वास्थ्य ठीक रहता हो और माता-पिताका वियोग बहुत खलता न हो तो। जबतक दोनों न आ सको तबतक वह वहीं रहे इसमें मुझे कोई बुराई नहीं दिखाई देती। अर्थात् तुम दोनोंकी जो इच्छा हो, उसी के अनुसार करना। सुशीलाकी इच्छा आनेकी हो तो उसे बिलकुल न रोकना। छापा आदिका ठोक बन्दोबस्त न हो सके तो तुम्हारा आना नहीं हो सकता। रामदासका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। वह अभी मानसिक रोगसे मुक्त नहीं हुआ। मेरा स्वास्थ्य तो अच्छा हो है। आजकल मेरे खुराक सम्बन्धी प्रयोगके विषय में 'नवजीवन' और 'यंग इंडिया में पढ़ोगे।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जो° एन° ४७५५) को फोटो-नकलसे।
४४. पत्र : माधवजी वी° ठक्करको
बरेली
१३ जून, १९२९
तुम्हारे पत्रके जवाब में एक बात रह गई थी। सामान लानेके बारेमें तुम बहुत सावधान रहना चाहो तो दो कटोरे, एक थाली और एक लोटा ले आना। उद्योग मन्दिर में पहुँचनेकी तारीख अभी निश्चित नहीं कर सका हूँ, किन्तु जुलाईके पहले सप्ताह में वहाँ पहुँच ही जाऊँगा।
मोहनदासके वन्देमातरम्
गुजराती (जी° एन° ६७८८) की फोटो-नकलसे।