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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/८५

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४५. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको

बरेली
१३ जन, १९२९

भाई घनश्यामदासजी,

हरभाई दक्षिणामूर्ति भवनमें नानाभाईके साथी हैं। नानाभाई बीमार हो गये हैं। वर्धमें इस विद्यालयके बारेमें हमारे बीचमें बात हुई थी इसपर से मैं उनको आपके पास भेजता हूं। इस संस्थाको क्या मदद देना वह आप ही सोचनेवाले थे। आज तो मैंने नानाभाईको अभयवचन भेज दीया है। वह आप ही के दानके आधारसे हैं। अब आप हरभाईसे सब बात सुन लेंगे, संस्थाका हिसाब देखेंगे और उचित करेंगे।

आपका,
मोहनदास

सी° डब्ल्यू° ६१७३ से।
सौजन्य : घश्यामदास बिड़ला
 

४६. भाषण : नैनीतालमें

१४ जून, १९२९

अब मेरे पास सन् २१ की-सी आवाज नहीं है, अब मुझे बोलना बन्द कर देना चाहिए। मैं बोलना भी नहीं चाहता, किन्तु जो मनुष्य अपनेको दरिद्रनारायणका प्रतिनिधि कहे वह भिक्षा माँगना छोड़ नहीं पाता। मैं अशक्त हो गया हूँ। किन्तु आप मुझको कुछ देते रहते हैं। इसलिए मैं इस लालचको छोड़ नहीं सकता। मानपत्र और थैलोके लिए धन्यवाद। समय बचानेके लिए काव्य-पाठका कार्यक्रम छोड़ दिया गया उसके लिए एहसान मानता हूँ। जिला बोर्डके अध्यक्षने सारा मानपत्र नहीं पढ़ा; धन्यवाद। आपने पैसे काफी नहीं दिये। यहाँ जो भाई हैं वे गरीब नहीं हैं। गरीबोंके कन्धेपर सवारी करनेवाले हैं। मैं उनको याद दिलाने आया हूँ कि वे अपने कर्त्तव्य को पहिचानें। यहाँकी आबादी ३ लाखसे २ लाख हो गई है। इतनी कमी क्यों हुई? आबोहवा अच्छी होने पर भी यहाँ पर ह्रास क्यों? इतने लोग मर गये या कहीं चले गये? लोगोंके पास धन्धा नहीं है। बेकारीसे लोग तंग हैं। हमने अपना ऊन विदेशोंमें या मिलोंमें भेज दिया। मिलके कपड़े पहन-पहनकर हम गरीबोंके हाथसे रोटीका टुकड़ा छीन रहे हैं। हमारी रुचि बदल गई है। हम स्वदेशी कपड़ोंको खराब समझते हैं और मिलके कपड़ोंको हम अच्छा समझते हैं। हमें साहब लोगों जैसे कपड़े

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