ने यह काम फिरसे अपने हाथों में लिया है। अगर युवक वर्ग उनकी मदद पर दौड़ जाये, तो बहुत-कुछ सुधार हो सकता है। युवकगण सभामें जा सकते हैं, नाटक खेल सकते हैं, जुलूस निकाल सकते हैं। ये सब काम अच्छे हैं और एक मर्यादामें रहकर करने योग्य हैं। मगर तनिक-से भी रचनात्मक कामके सामने इनकी कीमत नगण्य है। नौजवानोंको अपने हाथों सड़कें साफ करनी चाहिए, गटरें और मोरियाँ धोनी चाहिए। हम सबको भंगी बनना आना चाहिए। जो बात मोहल्लोंके सुधारके बारेमें ठीक है, वही दूसरे कई कामोंके बारेमें भी उपयुक्त है। अगर विद्यार्थी अपने आपको सच्ची स्वराज्य सेनामें बदलना चाहते हैं तो उन्हें व्याख्यानबाजीसे हटकर रचनात्मक कामोंमें जुट जाना चाहिए। विद्यार्थियोंकी रिपोर्टमें भाषणों, नाटकों आदि के जिक्रकी जगह अब तो यह लिखा जाना चाहिए कि उन्होंने इन कामोंके सिवा कितने पाखाने साफ किये, कितने गाँवोंके कुओंकी सफाई की, कितने बाँध बाँधे, कितने मरीजों-रोगियोंकी सेवा की, कितनी खादी बुनी, कितने तालाब या कुएँ खोदे और कितनी रात्रिशालाओं आदिका संचालन किया।
नवजीवन, १६-६-१९२९
४८. वनपक्व बनाम अग्निपक्व
कुछ लोग मुझे मूर्ख, सनकी या खब्ती मानते हैं। मुझे स्वीकार करना चाहिए कि मैं जहाँ भी जाता हूँ, मूर्ख, सनकी और दीवाने मुझतक पहुँच ही जाते हैं। इसपर से ऐसा जान पड़ता है कि उक्त तीनों 'गुण' मुझमें होने चाहिए। आन्ध्र-प्रदेशमें पर्याप्त संख्या में इन तीनों गुणवाले लोगोंके नमूने मुझे मिल रहे हैं। कुछ लोग तो ठेठ उद्योग-मन्दिरतक आ पहुँचते हैं, तब फिर मैं आन्ध्र प्रदेशमें जाऊँ और वे न मिलें यह तो सम्भव ही नहीं हो सकता । किन्तु फिलहाल मैं इन तोनों जातियोंके सज्जनोंसे पाठकोंका परिचय कराने नहीं जा रहा हूँ। मेरी सनकोंमें खुराकके प्रयोग एक 'सनक' है। मैं यहाँ खुराकके एक सनकीसे ही पाठकोंको परिचित कराना चाह रहा हूँ। क्योंकि उनके प्रभावमें पड़कर मैंने जो प्रयोग प्रारम्भ किया है, उसके बारेमें लिखनेकी मेरी इच्छा है। इनका नाम है सुन्दरम् गोपालराव। वे राजमहेन्द्री में रहते हैं। वे जल-चिकित्सा और आहार-चिकित्साका एक आरोग्य भवन चलाते हैं। उनकी देखरेख में अनेक लोगोंको लाभ हुआ है–ऐसा मुझसे कहा गया और मैंने इसपर विश्वास भी किया है।
गोपालराव एक सालसे कच्चे अनाजपर ही जी रहे हैं। उनका विश्वास है कि मनुष्यकी खुराकको अग्निका स्पर्श न होना चाहिए। सूर्य पोषक है, अग्नि नाशक है। सूर्य अन्न पकाता है, अग्नि उसका सत्व छीन लेती है। अग्नि-स्पर्शसे अनाजका सत्त्व जल जाता है। इसी विचारधाराके सहारे उन्होंने अग्निके सम्पर्क में आये हुए अन्नका त्याग किया और स्वयं अनुभव करके उसे अपने रोगियोंपर आजमा कर देखा।